सनातन धर्म में चातुर्मास केवल चार महीनों की समयावधि नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, तप, संयम और ईश्वर भक्ति का सर्वोत्तम अवसर माना गया है। इसकी शुरुआत आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से होती है और समापन कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर होता है। वर्ष 2026 में चातुर्मास 25 जुलाई से 21 नवंबर तक रहेगा।
धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और अन्य मांगलिक कार्य स्थगित कर दिए जाते हैं। दूसरी ओर, पूजा-पाठ, जप, तप, व्रत, दान और सत्संग का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
शास्त्रों में क्या कहा गया है?
श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित है कि वामन अवतार के समय राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया था कि वे प्रत्येक वर्ष चार महीने उनके लोक में निवास करेंगे। इसी कारण देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी पर पुनः जागृत होते हैं।
स्कंद पुराण में कहा गया है-
“चातुर्मास्ये विशेषेण विष्णोः पूजां समाचरेत्।”
अर्थात् चातुर्मास में भगवान विष्णु की विशेष आराधना करने से अनेक यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है।
वहीं पद्म पुराण में उल्लेख है कि चातुर्मास के दौरान किया गया दान, जप और व्रत सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होता है।
भगवान विष्णु के विश्राम के दौरान शिव संभालते हैं सृष्टि का संचालन
सनातन परंपरा के अनुसार, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, तब देवाधिदेव महादेव सृष्टि के संचालन की प्रमुख भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि चातुर्मास की शुरुआत के साथ आने वाला सावन मास भगवान शिव की आराधना का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है।
इन 120 दिनों में आते हैं कई प्रमुख पर्व
चातुर्मास केवल परहेज का समय नहीं, बल्कि धार्मिक उत्सवों का भी स्वर्णिम काल है। इसी दौरान श्रद्धालु सावन सोमवार, नाग पंचमी, हरियाली तीज, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, पितृ पक्ष, शारदीय नवरात्रि, विजयादशमी, करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, छठ पूजा और अंत में देवउठनी एकादशी जैसे पर्व मनाते हैं।
आयुर्वेद भी बताता है चातुर्मास का महत्व
आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में शरीर की जठराग्नि (पाचन शक्ति) कमजोर हो जाती है। वातावरण में नमी बढ़ने से संक्रमण, बैक्टीरिया और जलजनित रोगों का खतरा भी अधिक रहता है। इसलिए शास्त्रों में खान-पान के विशेष नियम बनाए गए हैं।
- तामसिक भोजन से परहेज करें।
- बासी भोजन न खाएं।
- सात्विक और सुपाच्य भोजन लें।
- भाद्रपद में दही का सेवन सीमित रखें।
- आश्विन में दूध का संयमित उपयोग करें।
- कार्तिक में मूली, बैंगन और उड़द जैसी वस्तुओं से परहेज का उल्लेख मिलता है।
इन नियमों का उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संरक्षण भी है।
चातुर्मास में क्या करें?
शास्त्रों और संतों के अनुसार इस अवधि में-
- भगवान विष्णु एवं भगवान शिव का नियमित पूजन करें।
- विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत और रामचरितमानस का पाठ करें।
- एकादशी, प्रदोष, तीज और शिवरात्रि जैसे व्रत श्रद्धा से रखें।
- दान-पुण्य, गौसेवा और जरूरतमंदों की सहायता करें।
- योग, प्राणायाम और ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।
- क्रोध, झूठ, चुगली और कटु वचन से बचें।
- संयमित एवं सात्विक जीवनशैली अपनाएं।
जैन परंपरा में भी विशेष महत्व
चातुर्मास केवल सनातन धर्म तक सीमित नहीं है। जैन धर्म में भी इस अवधि का विशेष महत्व है। वर्षा ऋतु में साधु-संत एक स्थान पर रहकर प्रवचन, स्वाध्याय और तपस्या करते हैं तथा समाज को धर्म और संयम का संदेश देते हैं।
चातुर्मास का वास्तविक संदेश
चातुर्मास का उद्देश्य केवल विवाह रोकना या कुछ खाद्य पदार्थों का त्याग करना नहीं है। इसका मूल संदेश है—जीवन में अनुशासन, आत्मसंयम, सेवा, साधना और आत्मशुद्धि। यह वह समय है जब व्यक्ति बाहरी भोग-विलास से हटकर अपने भीतर झांकता है और ईश्वर के साथ अपने संबंध को मजबूत करता है।
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में चातुर्मास हमें यह सिखाता है कि कुछ समय स्वयं के लिए, अपने मन के लिए और अपने ईश्वर के लिए भी निकालना आवश्यक है। यही चार महीने मन, शरीर और आत्मा के संतुलन का सबसे सुंदर अवसर बन जाते हैं।


