महेश दीक्षित
मध्य प्रदेश सरकार ने भवन निर्माण की अनुमति प्रक्रिया को आसान बनाने का फैसला किया है। कई विभागों से अनिवार्य अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनओसी) लेने की बाध्यता खत्म कर दी गई है। ऑनलाइन प्रक्रिया, डिजिटल दस्तावेज और समय सीमा जैसी व्यवस्थाएं निश्चित रूप से आम नागरिकों और निवेशकों के लिए राहत लेकर आएंगी। वर्षों से भवन अनुमति के नाम पर विभागों के चक्कर काटने की शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में प्रक्रिया का सरलीकरण जरूरी था।
लेकिन सवाल यह है कि क्या अनुमति आसान होने के साथ निगरानी व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत की गई है? क्योंकि अनुभव बताता है कि नियमों की जटिलता कम करना जितना जरूरी है, नियमों का पालन सुनिश्चित करना उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।
शहरों में अवैध निर्माण की समस्या पहले से मौजूद है। बिना स्वीकृति निर्माण, नक्शे के विपरीत अतिरिक्त मंजिलें बनाना, पार्किंग और खुले स्थानों के नियमों की अनदेखी जैसी शिकायतें आम हैं। ऐसे में यदि कई विभागों की एनओसी की बाध्यता समाप्त की जा रही है तो स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
सरकार ने व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए ऑनलाइन सिस्टम और तय समय सीमा का प्रावधान किया है, लेकिन केवल डिजिटल प्रक्रिया से व्यवस्था सुधर नहीं सकती। जरूरत इस बात की है कि ऑनलाइन आवेदन की जांच प्रभावी हो, मौके पर निरीक्षण की व्यवस्था मजबूत रहे और नियम तोड़ने वालों पर तत्काल कार्रवाई हो।
अक्सर देखा गया है कि शुरुआत में नियमों में राहत जनता के लिए सुविधा बनती है, लेकिन बाद में कमजोर निगरानी के कारण यही राहत कुछ लोगों के लिए मनमानी का रास्ता खोल देती है। शहरों का विकास केवल ज्यादा इमारतें खड़ी करने से नहीं होता, बल्कि सुनियोजित निर्माण से होता है। भवन अनुमति प्रक्रिया सरल होनी चाहिए, लेकिन शहरों की सुरक्षा, पर्यावरण और भविष्य की जरूरतों से समझौता नहीं किया जा सकता। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि नई व्यवस्था भ्रष्टाचार और देरी को खत्म करे, न कि नियमों को दरकिनार करने का माध्यम बन जाए।
आसान अनुमति स्वागत योग्य है, लेकिन इसके साथ सख्त निगरानी भी जरूरी है। वरना आज की सुविधा कल के अव्यवस्थित शहरों की बड़ी समस्या बन सकती है।


