मनुष्य सदियों से ईश्वर की खोज करता आया है। कोई मंदिरों में भगवान को ढूंढता है, कोई तीर्थों में जाता है और कोई कठिन साधनाओं के माध्यम से परम सत्य को पाने का प्रयास करता है। लेकिन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का मूल संदेश है कि परमात्मा कहीं दूर नहीं, बल्कि हमारे अपने अंतर्मन में विद्यमान हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-
“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।”
(गीता 18.61)
अर्थात् ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। परमात्मा हमारे भीतर ही हैं, लेकिन अज्ञान, अहंकार और सांसारिक मोह के कारण मनुष्य उन्हें बाहर खोजता रहता है।
संत रबिया की सुई वाली कथा का संदेश
संत रबिया एक बार अपनी झोपड़ी के बाहर कुछ खोज रही थीं। वहां से गुजर रहे लोगों ने पूछा कि वह क्या ढूंढ रही हैं। उन्होंने कहा कि उनकी सुई खो गई है। लोग उनकी सहायता करने लगे और काफी देर तक खोजते रहे, लेकिन सुई नहीं मिली।
जब एक व्यक्ति ने पूछा कि सुई वास्तव में कहां गिरी थी, तो रबिया ने बताया कि वह झोपड़ी के अंदर गिरी है। व्यक्ति ने आश्चर्य से पूछा कि फिर बाहर क्यों खोज रही हैं?
रबिया ने उत्तर दिया कि अंदर अंधेरा है, इसलिए बाहर खोज रही हूं।
यही बात उन्होंने मनुष्य को समझाने के लिए कही कि हम भी ईश्वर को बाहर खोज रहे हैं, जबकि वह हमारे भीतर मौजूद हैं। आवश्यकता केवल अंतर्मन में ज्ञान का प्रकाश जलाने की है।
उपनिषदों में भी है आत्मा में परमात्मा का संदेश
उपनिषदों में कहा गया है-
“अयमात्मा ब्रह्म”
(माण्डूक्य उपनिषद)
अर्थात् यह आत्मा ही ब्रह्म है। हमारे भीतर स्थित चेतना उसी परम सत्ता का अंश है। जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है, तब उसे ईश्वर की अनुभूति होती है।
भक्ति और ज्ञान से प्रसन्न होते हैं भगवान
भगवान को प्रसन्न करने के लिए केवल बाहरी कर्मकांड पर्याप्त नहीं हैं। सच्ची श्रद्धा, निर्मल मन, सेवा भावना और आत्मज्ञान का मार्ग ही ईश्वर तक पहुंचाता है।
श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं-
“पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥”
(गीता 9.26)
अर्थात् जो भक्त प्रेम और श्रद्धा से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल भी अर्पित करता है, मैं उसे स्वीकार करता हूं।
यहां भगवान वस्तु नहीं, बल्कि भक्त की भावना देखते हैं।
संत कबीर ने बताया ईश्वर खोजने का सही मार्ग
संत कबीर कहते हैं-
“वस्तु कहीं, ढूंढे कहीं, विधि आवै हाथ।
कहे कबीर तब पाइये, जब भेदी लीन्हा साथ॥”
कबीर का संदेश है कि जब तक मनुष्य सही मार्ग और सही ज्ञान प्राप्त नहीं करता, तब तक वह सत्य की खोज में भटकता रहता है। एक ज्ञानी गुरु जीवन के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर आत्मज्ञान का मार्ग दिखाता है।
अंतर्मन में जलाएं ज्ञान का दीपक
ईश्वर को रिझाने का सबसे सरल मार्ग है-मन को पवित्र करना, अहंकार को त्यागना, दूसरों के प्रति प्रेम रखना और अपने भीतर स्थित परम चेतना को पहचानना।
जिस प्रकार अंधेरे कमरे में वस्तु खोजने के लिए दीपक आवश्यक होता है, उसी प्रकार आत्मा में छिपे परमात्मा को जानने के लिए ज्ञान का प्रकाश आवश्यक है।
जब मनुष्य अपने भीतर के सत्य को पहचान लेता है, तब उसे अनुभव होता है कि जिसे वह संसार में खोज रहा था, वह सदैव उसके अपने हृदय में ही विराजमान था।


