वाशिंगटन डीसी। रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अमेरिकी सीनेट ने रूस पर नए प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक को आगे बढ़ाने की मंजूरी दे दी है। यदि यह विधेयक कानून बनता है तो भारत सहित पांच देशों पर 100 फीसदी तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगाया जा सकता है।
इस विधेयक का उद्देश्य यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। रूस से सबसे अधिक कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में चीन के बाद भारत दूसरे स्थान पर है। ऐसे में भारत पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
सीनेट में हुए मतदान में 86 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में जबकि 12 सांसदों ने विरोध में वोट दिया। प्रस्तावित कानून में रूस के अधिकारियों पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ भारत, चीन, हंगरी, स्लोवाकिया और अजरबैजान जैसे देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है।
यह विधेयक अप्रैल 2025 में पेश किया गया था। इसके प्रमुख प्रस्तावक दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम थे। इससे पहले भी अमेरिकी नेतृत्व रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर भारत पर दबाव बना चुका है।
रूसी तेल पर क्यों बढ़ी भारत की निर्भरता?
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाओं के कारण खाड़ी देशों से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई। इसके बाद भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से तेल आयात बढ़ाया। जून 2026 में भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
ऊर्जा और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (CREA) के अनुसार, जून 2026 में भारत ने रूस से लगभग 4.5 अरब यूरो मूल्य का कच्चा तेल खरीदा, जो रूस के कुल तेल निर्यात राजस्व का लगभग 36 प्रतिशत था।
पहले भी लगा था अतिरिक्त टैरिफ
अमेरिका ने अगस्त 2025 में रूस के साथ ऊर्जा व्यापार को लेकर भारत पर अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। इसके बाद भारत पर कुल अमेरिकी टैरिफ 50 फीसदी तक पहुंच गया था। हालांकि बाद में वैश्विक ऊर्जा संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के चलते अमेरिका ने रूसी तेल खरीद पर कुछ राहत दी थी।
अब नया प्रतिबंध विधेयक आगे बढ़ने के बाद भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और ऊर्जा सुरक्षा पर फिर से नए सवाल खड़े हो गए हैं।


