नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों के बीच आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में 15 बिंदुओं वाला जवाबी हलफनामा दाखिल कर अपना पक्ष रखा है। आयोग ने मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में किसी भी संशोधन से इनकार किया है। दूसरी ओर, विपक्ष ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया, आधिकारिक रिकॉर्ड की उपलब्धता और पात्र मतदाताओं को सुनवाई का अवसर देने जैसे मुद्दे उठाए हैं। अब इस विवाद में आयोग की दलीलों के साथ विपक्ष की आपत्तियां भी न्यायिक परीक्षण के दायरे में हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने हलफनामे को सर्वसम्मति से मंजूरी दी। आयोग ने याचिका के आधार पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित है।
विपक्ष ने उठाए पारदर्शिता पर सवाल
यह मामला राहुल गांधी और विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के अन्य नेताओं की याचिका से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया था। याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर से जुड़े आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करने, मतदाता सूची से हटाए गए नामों का स्वतंत्र ऑडिट कराने और बूथवार सूची उपलब्ध कराने की मांग की है।
विपक्ष का तर्क है कि किसी पात्र मतदाता का नाम बिना सूचना दिए और उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना सूची से नहीं हटाया जाना चाहिए। विपक्ष एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी कर रहा है। उसकी प्रमुख चिंता यह है कि पुनरीक्षण के दौरान किसी योग्य नागरिक का मताधिकार प्रभावित न हो और नामों को हटाने या जोड़ने की प्रक्रिया पारदर्शी रहे।
फॉर्म-6 में बदलाव से आयोग का इनकार
आयोग ने हलफनामे में कहा कि फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया है। उसके मुताबिक, इस फॉर्म में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। एसआईआर के लिए इस्तेमाल होने वाला घोषणा पत्र फॉर्म-6 से अलग दस्तावेज है। आयोग ने स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन में दोनों दस्तावेजों को प्रदर्शित करने के तरीके से बदलाव का भ्रम पैदा हो सकता था। इसे दूर करने के लिए 21 अक्तूबर से दोनों को अलग-अलग दिखाने की व्यवस्था किए जाने की बात कही गई है।
आयोग ने यह भी कहा कि जून 2025, अक्तूबर 2025 और मई 2026 में एसआईआर को लेकर जारी तीनों आदेश सर्वसम्मति से पारित किए गए थे। उसके अनुसार, फाइलों पर चुनाव आयुक्तों की टिप्पणियों और सुझावों को अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।
मतदाताओं की सुनवाई पर क्या कहा?
पुराने दस्तावेजों से मतदाताओं का रिकॉर्ड नहीं जुड़ पाने के मामले में आयोग ने कहा कि बूथ स्तर के अधिकारी संबंधित मतदाताओं के घर जाकर दस्तावेज जुटाएंगे। सामान्य तौर पर ऐसे मतदाताओं को सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होगी, हालांकि विशेष मामलों में सुनवाई की जाएगी।
गोवा में सूची से छूटे बताए गए 97 लोगों के मामले में आयोग ने कहा कि 88 पहले से मतदाता के रूप में दर्ज थे, छह विदेश में थे और तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे। पश्चिम बंगाल की अपीलों के संबंध में आयोग ने कहा कि संबंधित मामले उसके सामने नहीं लाए गए थे।
अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर नजर
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग वाली याचिका को आयोग ने कानूनी रूप से विचार योग्य नहीं बताया। उसने आंतरिक दस्तावेजों को मीडिया के लिए जारी करने की मंजूरी देने से भी इनकार किया।
आयोग ने अपने हलफनामे में प्रक्रिया और निर्णयों का बचाव किया है, जबकि विपक्ष ने पारदर्शिता, स्वतंत्र जांच और मतदाताओं के अधिकारों का सवाल उठाया है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के सामने केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का नहीं, बल्कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता और पात्र नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा का प्रश्न भी महत्वपूर्ण रहेगा। अब आगे की सुनवाई में दोनों पक्षों की दलीलों पर न्यायालय का रुख अहम होगा।


