महेश दीक्षित
मप्र भाजपा के एक माननीय इन दिनों राजनीति के साथ कारोबार की नई पारी शुरू करने की तैयारी में बताए जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उन्होंने भोपाल की चर्चित ‘एसजी’ फास्ट फूड चेन में बड़ी हिस्सेदारी लेने की तैयारी कर ली है। बताते हैं कि जिस कंपनी में निवेश की चर्चा है, उसके मौजूदा संचालक अपना कारोबार समेटकर नेपाल शिफ्ट होने की तैयारी में हैं। दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिक हलकों में निवेश से ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि इतनी बड़ी रकम का इंतजाम कैसे हुआ? सवाल उठाए जा रहे हैं कि माननीय का मुख्य पेशा राजनीति है। अन्य कोई घोषित आय का स्रोत सामने नहीं है, तो फिर इतने बड़े निवेश के लिए पूंजी कहां से आई? नारदजी बता देंं कि माननीय बनने से पहले नेताजी भाजपा संगठन में एक महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
भाजपा की आधारहीन अचंभियां!
राजनीति में कुछ चेहरे अपने जनाधार और संगठनात्मक पकड़ के दम पर चमकते हैं, तो कुछ केवल नेताओं की परिक्रमा के सहारे कद और पद हासिल कर लेते हैं। भाजपा में इन दिनों ऐसी ही कुछ ‘आधारहीन अचंभियां’ चर्चा का विषय बनी हुई हैं। न कोई मजबूत जनाधार, न कार्यकर्ताओं का व्यापक समर्थन, लेकिन पिछले कुछ वर्षों तक सत्ता-संगठन के गलियारों में इनका खासा प्रभाव रहा। संगठन में पद भी आसानी से मिले और बड़े नेताओं तक सीधी पहुंच भी बनी रही। मगर वक्त बदला तो पद के साथ प्रभाव भी धीरे-धीरे कम होता चला गया। पदविहीन चल रहीं इन नेत्रियों का हाल इन दिनों यह है कि जहां भी कोई बड़ा राजनीतिक आयोजन होता है, वहां ये बिन बुलाए मेहमान की तरह अपनी मौजूदगी दर्ज करा ही देती हैं। बड़े नेताओं से एक मुलाकात, दो-चार मुस्कुराती तस्वीरें और कुछ सेल्फियां… अब यही उनकी सक्रिय राजनीति का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र बन गया है। फिलहाल ये ‘आधारहीन अचंभियां’ भोपाल से दिल्ली की परिक्रमा में जुटी हुई हैं। इस उम्मीद में कि, शायद मोहनी सूरत पर हाईकमान की नजर-ए-इनायत हो जाए, फिर कोई नई जिम्मेदारी मिल जाए!
डबल मनी कांड में दो बड़े नेताओं के नाम!
राजनीति में दाग लगने में देर नहीं लगती, लेकिन उसे साफ करने में कई बार पूरी उम्र गुजर जाती है। बालाघाट के बहुचर्चित ?600 करोड़ के डबल मनी कांड को ही देख लीजिए। वर्षों से फरार चल रहा मुख्य आरोपी जब पुलिस की गिरफ्त में आया, तो उसके कथित कबूलनामे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। चर्चा है कि आरोपी ने पूछताछ में दावा किया है कि सरकारी संरक्षण दिलाने के एवज में एक पूर्व भाजपा विधायक को टाटा हैरियर गाड़ी और सोने के आभूषण दिए गए। इतना ही नहीं, आरोपी ने तत्कालीन शिवराज सरकार के एक पूर्व मंत्री, जो वर्तमान में भाजपा के जिला अध्यक्ष हैं, तक 10 करोड़ रुपये पहुंचाए जाने का भी दावा किया है। अब देखना यह होगा कि पार्टी आरोपी के दावों को नजरअंदाज करती है या फिर मामले की गंभीरता को देखते हुए अपने दोनों दागी नेताओं पर कार्रवाई का डंडा चलाती है।
पंडितजी को सता रही बेटे के भविष्य की चिंता!
दतिया उपचुनाव में भाजपा के एक बड़े चेहरे का टिकट कटने के बाद से कई दिग्गज नेताओं की नींद उड़ी हुई है। सभी अपने-अपने हिसाब से 2028 के सियासी समीकरण साधने में जुटे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा बेचैनी इन दिनों पार्टी के वरिष्ठतम पंडितजी के चेहरे पर नजर आ रही है। चर्चा है कि उन्हें अब अपनी राजनीतिक पारी से ज्यादा बेटे के भविष्य की चिंता सताने लगी है। पंडितजी को महसूस होने लगा है कि उनकी सियासी पारी अब ढलान पर है और वर्षों से जिस राजनीतिक विरासत को बेटे के हाथों सौंपने का सपना देखा था, उस पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। बताते हैं कि हाल ही में उन्होंने अपने एक करीबी से मन की पीड़ा साझा करते हुए कहा-हमारा तो जो होना था, हो गया…लेकिन अगर ‘अभि’ को ही मौका नहीं मिला, तो इतने वर्षों की मेहनत और राजनीतिक विरासत का क्या होगा?
सीएस की कुर्सी के लिए आखिर तक चली लॉबिंग!
मुख्य सचिव की कुर्सी भले ही भर गई हो, लेकिन उसकी कहानी अभी भी मंत्रालय के गलियारों में गूंज रही है। चर्चा है कि ताजपोशी की अंतिम घोषणा तक कई दावेदारों ने दिल्ली से भोपाल तक अपने संपर्कों की पूरी ताकत झोंक दी थी। जोड़-घटाव, सियासी समीकरण और सिफारिशों का दौर आखिरी समय तक चलता रहा। चर्चा तो यहां तक है कि अंतिम फैसले से ठीक पहले नए मुख्य सचिव से जुड़े विभाग को लेकर कुछ नकारात्मक खबरें भी हवा में उड़ाई गईं। इसे महज संयोग माना जाए या किसी रणनीति का हिस्सा, इसकी अलग-अलग व्याख्याएं हो रही हैं। सबसे दिलचस्प नजारा पदभार ग्रहण समारोह में देखने को मिला। एक दावेदार अधिकारी ने निवर्तमान मुख्य सचिव की तारीफों के खूब पुल बांधे, लेकिन नए मुख्य सचिव के स्वागत में उनके शब्द जैसे गले में ही अटक गए। नारदजी कहते हैं कि कुर्सी पर चेहरा जरूर बदल गया है, लेकिन उसके इर्द-गिर्द घूमने वाली लॉबिंग की राजनीति अभी खत्म नहीं हुई है।


