शिक्षा माफिया के ठेंगे पर विदिशा का शिक्षा विभाग
विदिशा। विदिशा जिले का शिक्षा विभाग इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है। विभागीय सूत्रों का दावा है कि शिक्षा विभाग के कई महत्वपूर्ण फैसले कथित रूप से प्रभावशाली शिक्षा माफिया की सहमति के बिना नहीं लिए जाते। ताजा विवाद ने न केवल विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता और जवाबदेही को लेकर भी बहस छेड़ दी है।
मामला एमएलबी गर्ल्स स्कूल की प्राचार्य ‘सुदर्शना प्राचार्य’ और खेल अधिकारी संतोष चतुर्वेदी के बीच विवाद का है। आरोप है कि विद्यालय में खेल सामग्री एवं पुरस्कार वितरण से जुड़ी आवश्यक सामग्री प्राचार्य के निर्देश पर मंगाई गई थी। खेल अधिकारी द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरण के आधार पर संबंधित आपूर्तिकर्ता ने सामग्री विद्यालय को उपलब्ध भी करा दी। प्रारंभिक भुगतान तो कर दिया गया, लेकिन बाद में दूसरे बिल का भुगतान रोक दिया गया। बताया जाता है कि दूसरी खेप में ऐसी सामग्री शामिल थी जिस पर विद्यालय से संबंधित लेखन एवं प्रिंटिंग कार्य हो चुका था, जिसके कारण उसे वापस लेना संभव नहीं था। भुगतान की मांग किए जाने पर प्राचार्य ने कथित रूप से सामग्री स्वीकार करने से ही इंकार कर दिया, जिसके बाद विवाद गहराता चला गया।
मुख्यमंत्री भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते
विवाद का सबसे चर्चित पहलू वह कथित बयान है, जिसमें ‘सुदर्शना प्राचार्य’ द्वारा खेल अधिकारी से कहा गया कि ‘मेरा मुख्यमंत्री भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते, तुम्हारी हैसियत क्या है?’ सूत्रों के अनुसार यह टिप्पणी भुगतान विवाद के दौरान हुई तीखी बहस के बीच की गई थी। इसके बाद मामला और गर्मा गया, जब प्राचार्य ने खेल अधिकारी संतोष चतुर्वेदी के खिलाफ जान से मारने की धमकी देने की शिकायत पुलिस में दर्ज करा दी। दूसरी ओर चतुर्वेदी ने आरोपों को पूरी तरह निराधार और मनगढ़ंत बताया है।
खेल अधिकारी का कहना है…
खेल अधिकारी संतोष चतुर्वेदी का कहना है कि उन्होंने केवल विद्यालय प्रशासन के निर्देशों के अनुरूप सामग्री उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में सहयोग किया था। उनका तर्क है कि यदि विद्यालय प्रबंधन को सामग्री किसी अन्य स्रोत से खरीदनी थी तो ऐसा पहले किया जा सकता था, लेकिन सामग्री मंगवाने, उसका उपयोग होने और बाद में भुगतान रोक देने का कोई औचित्य नहीं है। चतुर्वेदी ने कहा कि उन पर लगाए गए गंभीर आरोपों से वे और उनका परिवार मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब ‘सुदर्शना प्राचार्य’ कथित रूप से मुख्यमंत्री तक को महत्व नहीं देतीं, तो उनकी क्या हैसियत है कि वे उनसे किसी प्रकार की अभद्रता या धमकी दे सकें।
पहले भी उठते रहे हैं सवाल
शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के बीच ‘सुदर्शना प्राचार्य’ की कार्यशैली को लेकर पहले भी चर्चाएं होती रही हैं। विभागीय सूत्रों का दावा है कि उनके प्रभाव के चलते कई अधिकारी खुलकर निर्णय लेने से बचते हैं। कुछ कर्मचारियों का आरोप है कि विभाग में प्रभावशाली लोगों का एक ऐसा समूह सक्रिय है, जो अपने विरोध में खड़े कर्मचारियों पर दबाव बनाने और उन्हें परेशान करने का काम करता है। इस पूरे मामले में प्राचार्य का पक्ष जानने के लिए कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका मोबाइल फोन बंद मिला। वहीं जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ने मामले की जानकारी नहीं होने की बात कही। दूसरी ओर एक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) ने अनौपचारिक चर्चा में कहा कि ‘प्राचार्य अक्सर तथ्यों से इतर बातें करती हैं।’
सवालों के घेरे में शिक्षा विभाग
-सामग्री की मांग आखिर किसके निर्देश पर की गई थी?
-यदि सामग्री उपयोग में आ चुकी थी तो भुगतान क्यों रोका गया?
-धमकी के आरोपों के समर्थन में क्या कोई ठोस साक्ष्य मौजूद हैं?
-विभागीय अधिकारियों ने अब तक मामले की क्या जांच की है?
-क्या प्रभावशाली लोगों का दबाव प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित कर रहा है?
-यदि कथित बयान सही है तो क्या यह प्रशासनिक अनुशासन की अवहेलना नहीं है?
मामला सिर्फ बिल भुगतान का नहीं
यह विवाद अब महज भुगतान संबंधी विवाद भर नहीं रह गया है। इससे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि शिक्षा विभाग में निर्णय वास्तव में कौन ले रहा है-प्रशासनिक व्यवस्था या कथित शिक्षा माफिया? अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच कर सच सामने लाने का साहस दिखाता है या नहीं।


