-महेश दीक्षित
मप्र कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महासचिव राकेश सिंह यादव का भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना राजनीतिक रूप से चर्चा का विषय जरूर है, लेकिन इसका वास्तविक असर क्या होगा, इसका आकलन अभी जल्दबाजी होगी। राजनीति में दल-बदल कोई नई घटना नहीं है, लेकिन हर दल-बदल अपने साथ कई संकेत छोड़ जाता है। इस घटनाक्रम ने भी ऐसे ही कुछ सवाल खड़े किए हैं।
राकेश सिंह यादव पिछले कुछ समय से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और संगठन प्रभारी हरीश चौधरी पर लगातार हमलावर थे। उन्होंने संगठन में पारदर्शिता की कमी, वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा, मनमानी कार्यशैली और टिकट वितरण जैसे मुद्दों पर खुलकर सवाल उठाए। कांग्रेस ने उनके आरोपों को खारिज करते हुए उन्हें अनुशासनहीनता के आधार पर निष्कासित कर दिया। इसके बाद उनका भाजपा में शामिल होना लगभग तय माना जा रहा था।
हालांकि, इस राजनीतिक घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भाजपा ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की मौजूदगी में सदस्यता तो दिला दी, लेकिन इस अवसर पर इंदौर के किसी बड़े भाजपा नेता की अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा को जन्म दे दिया। प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, पूर्व मंत्री उषा ठाकुर और वरिष्ठ नेता महेंद्र हार्डिया जैसे नेताओं का कार्यक्रम से दूर रहना कई तरह के राजनीतिक संकेत देता है। यह अनुपस्थिति केवल संयोग थी या फिर संगठन के भीतर किसी अलग सोच का संकेत, इस पर राजनीतिक विश्लेषकों की नजर बनी हुई है।
दूसरा बड़ा प्रश्न यह भी है कि भाजपा को इस शामिलीकरण से वास्तविक राजनीतिक लाभ कितना मिलेगा। राकेश सिंह यादव संगठनात्मक रूप से सक्रिय रहे हैं, लेकिन क्या उनके पास ऐसा जनाधार है जो चुनावी समीकरण बदल सके? यदि इसका उत्तर सकारात्मक नहीं है, तो यह शामिलीकरण अधिक प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक बढ़त का प्रयास माना जाएगा, जिसका उद्देश्य कांग्रेस को राजनीतिक संदेश देना हो सकता है।
कांग्रेस के लिए यह निश्चित रूप से एक असहज स्थिति है कि उसका एक पूर्व प्रदेश महासचिव सार्वजनिक रूप से संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठाने के बाद प्रतिद्वंद्वी दल में चला गया। वहीं भाजपा के सामने चुनौती यह रहेगी कि वह नए नेताओं को केवल सदस्यता तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें संगठन और जनता के बीच प्रभावी भूमिका भी दें। राजनीति में किसी भी दल-बदल का मूल्यांकन केवल सदस्यता ग्रहण करने से नहीं, बल्कि उसके चुनावी और संगठनात्मक परिणामों से होता है। इसलिए राकेश सिंह यादव की भाजपा में प्रवेश के बाद यह आकलन भी अभी जरूरी है कि राकेश सिंह यादव के भाजपा में आने से भाजपा को क्या फायदा हुआ है या होगा?


