-महेश दीक्षित
दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के नामांकन के दौरान अनायास जो दृश्य सामने आया, वो बिना कुछ कहे दतिया के चुनावी ‘मानस’ को बना गया और ‘जनमानस’ से कुछ कह गया। पूर्व गृहमंत्री और छह बार के विधायक डॉ. नरोत्तम मिश्रा मंच पर बोलते-बोलते भावुक हो गए। उनका गला रुंध गया और आंखों से अश्रु छलक पड़े। राजनीति में आंसू केवल भावनाएं नहीं होते, वे अक्सर ऐसे संदेश छोड़ जाते हैं, जिन्हें शब्द भी नहीं कह पाते।
राजनीति का एक अलिखित नियम है कि राजनेता अपने भीतर के आवेगों पर नियंत्रण रखना सीख लेता है। वर्षों की सार्वजनिक जिंदगी उसे सुख-दुख, सम्मान-अपमान और हार-जीत को चेहरे पर प्रकट न होने देने का अभ्यास करा देती है। डॉ. नरोत्तम मिश्रा भी ऐसे ही मंझे हुए, संतुलित और अनुभवी राजनेता हैं। चार दशक से अधिक की राजनीति में उन्होंने सत्ता का शिखर भी देखा और संघर्ष भी। ऐसे नेता का सार्वजनिक मंच पर भावनाओं पर नियंत्रण खो देना साधारण घटना नहीं माना जा सकता। इसलिए यह मानने का पर्याप्त आधार है कि जो बात वे अपने शब्दों से नहीं कह सके, वह उनकी आंखों से बह निकली।
करीब तीन दशक तक जिस नेता ने दतिया की धूल को अपनी राजनीति का तिलक बनाया हो, जिसने गांव-गांव, घर-घर और परिवार-परिवार तक पहुंचकर भाजपा को जन-जन की पार्टी बनाने में अपनी ऊर्जा लगा दी हो, जिसने क्षेत्र के सुख-दुख को अपना सुख-दुख माना हो, उसे यदि अचानक चुनावी मैदान से अलग कर दिया जाए, वह भी बिना किसी सार्वजनिक संवाद या राजनीतिक तैयारी के, तो उस पीड़ा को समझना कठिन नहीं है। संभव है कि वही वेदना उस दिन मंच पर आंखों के रास्ते बाहर आ गई हो।
डॉ. नरोत्तम मिश्रा की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष भी है। वे कभी पार्टी के किसी कथित ‘सिंडीकेट’ का हिस्सा नहीं रहे। उन्होंने न भोपाल में कोई समानांतर शक्ति केंद्र खड़ा करने की कोशिश की और न दिल्ली की राजनीति में अपना अलग साम्राज्य गढ़ने का प्रयास किया। उनकी राजनीति का केंद्र केवल दतिया रहा। उन्होंने अपना राजनीतिक भविष्य भी यहीं देखा और अपनी ऊर्जा भी इसी क्षेत्र के विकास में लगाई।
यही कारण है कि उन्होंने केवल अपना राजनीतिक कद नहीं बढ़ाया, बल्कि दतिया के विकास को भी नई पहचान दी। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और आधारभूत सुविधाओं के क्षेत्र में हुए अनेक कार्यों ने उन्हें केवल विधायक नहीं, बल्कि दतिया का जननेता बना दिया। समय के साथ वे क्षेत्र की राजनीति का पर्याय बन गए।
यह भी सच है कि कोई भी बड़ा नेता सर्वसम्मति का पात्र नहीं होता। जितना बड़ा कद होता है, उतनी ही बड़ी आलोचनाओं की काली परछाईयां भी उसके साथ चलती हैं। विरोधी भी बनते हैं, असंतोष भी पैदा होता है और कुछ लोग स्वयं को उपेक्षित भी महसूस करते हैं। लेकिन टिकट कटने के बाद दतिया में जिस प्रकार की भावनात्मक आक्रोश दिखाई दिया, उसने यह संकेत अवश्य दिया कि जनता के एक बड़े वर्ग के मन में नरोत्तम के प्रति अपनापन और सम्मान गहरे तक पैठ बनाए हुए है। शायद यही कारण है कि इन दिनों दतिया में एक वाक्य बार-बार सुनाई देता है-इतने ‘नरों’ (राजनेताओं) में नरोत्तम आज भी ‘उत्तम’ हैं।
संगठन का निर्णय सर्वोपरि होता है और नरोत्तम ने भी सार्वजनिक रूप से पार्टी के निर्णय को स्वीकार करते हुए अधिकृत प्रत्याशी के समर्थन का आह्वान किया। लेकिन राजनीति केवल संगठनात्मक अनुशासन से नहीं चलती, वह भावनाओं और विश्वास के धागों से भी बुनी जाती है। मंच पर छलके वे अश्रु शायद इसी मानवीय पक्ष का सबसे सशक्त प्रतीक थे।
संभव है, वे अश्रु केवल एक नेता की व्यक्तिगत पीड़ा न रहे हों। वे उन हजारों कार्यकर्ताओं की भावनाओं का भी प्रतिनिधित्व भी करते हों, जिन्होंने वर्षों तक नरोत्तम के साथ राजनीतिक यात्रा की। ऐसा लगा मानो उनकी आंखों से केवल उनके अपने नहीं, बल्कि दतिया के उन लोगों के भी अश्रु बह रहे थे, जिन्होंने उन्हें अपने परिवार का सदस्य माना।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन अश्रुओं का संदेश किसने कैसे पढ़ा? क्या भाजपा के वे रणनीतिकार, जिन्होंने नेतृत्व परिवर्तन का निर्णय लिया, नरोत्तम के अश्रुओं के संदेश के भाव को समझ पाए? या दतिया का मतदाता इसकी अलग व्याख्या करेगा? इसका उत्तर 30 जुलाई को होने वाला मतदान देगा। क्योंकि यह उपचुनाव केवल एक विधायक चुनने का चुनाव नहीं रह गया है। यह जनता और संगठन के बीच राजनीतिक संवेदनाओं की भी परीक्षा बन गया है।
फिलहाल इतना तो स्पष्ट है कि दतिया की उस चुनावी सभा में नरोत्तम की आंखों से बहे अश्रु इस उपचुनाव का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दृश्य बन चुके हैं। उन्होंने भाषण से अधिक असर छोड़ा, नारों से अधिक संदेश दिया और यह याद दिला दिया कि राजनीति चाहे जितनी कठोर क्यों न हो जाए, अंततः उसे जीने वाले लोग ही होते हैं। और जब एक मंझा हुआ, संयमित और दशकों का अनुभवी राजनेता अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाता, तब समझ लेना चाहिए कि भीतर का दर्द शब्दों की सीमा लांघ चुका है। निश्चित रूप से नरोत्तम के आंखों से छलके अश्रु दतिया उपचुनाव में गहरे तक आघात करेंगे।


