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    वक्फ बोर्ड विवाद: संवाद से सुलझेगा अविश्वास, टकराव से नहीं

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    मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति और उसके बाद शहर काजी तथा शहर मुफ्ती द्वारा बोर्ड अध्यक्ष डॉ. सनवर पटेल के स्वागत को लेकर उठा विवाद यह उस व्यापक बहस का हिस्सा है, जिसमें धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता, कानूनी प्रावधान और सामाजिक विश्वास तीनों साथ-साथ जुड़े हुए हैं।

    वक्फ अधिनियम-2025 के तहत राज्य वक्फ बोर्डों में विशेषज्ञ के रूप में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान किया गया है। दूसरी ओर, मस्जिद, मदरसा, दरगाह और स्थानीय वक्फ प्रबंधन समितियों में मुस्लिम प्रतिनिधित्व यथावत रहने की बात भी कानून में स्पष्ट की गई है। ऐसे में किसी भी बहस का आधार भावनाओं से अधिक विधिक प्रावधान और तथ्य होने चाहिए।

    डॉ. सनवर पटेल ने अपने वक्तव्य में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि शहर काजी और शहर मुफ्ती की उपस्थिति सम्मान और संवाद की परंपरा का हिस्सा थी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वक्फ संपत्तियों में कथित अनियमितताओं और अवैध कब्जों के विरुद्ध की गई कार्रवाई से प्रभावित कुछ समूह भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि ऐसा है तो इन दावों की पुष्टि भी तथ्यों और पारदर्शी कार्रवाई से ही हो सकती है। सार्वजनिक जीवन में आरोप और प्रत्यारोप से अधिक महत्व संस्थागत जवाबदेही का होता है।

    दूसरी ओर, शिया समुदाय सहित कुछ धार्मिक वर्गों की आशंकाओं को भी केवल विरोध मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। जब धार्मिक आस्था से जुड़े विषयों में बदलाव दिखाई देता है, तब स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं। ऐसे प्रश्नों का उत्तर संवाद, कानूनी स्पष्टता और विश्वास निर्माण से दिया जाना चाहिए, न कि तीखी टिप्पणियों से।

    लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी कानून की सफलता केवल उसके प्रावधानों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि संबंधित समाज उसे कितना स्वीकार करता है। इसलिए आवश्यक है कि वक्फ बोर्ड अपने हर निर्णय में अधिकतम पारदर्शिता रखे, वित्तीय प्रबंधन और संपत्तियों की सुरक्षा पर ठोस परिणाम सामने लाए तथा सभी पक्षों के साथ सतत संवाद बनाए। अंततः किसी भी धार्मिक संस्था की विश्वसनीयता उसके प्रशासन, निष्पक्षता और समाज के विश्वास से ही मजबूत होती है।

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