मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक और सामाजिक टकराव का नया रूप लेता दिखाई दे रहा है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन (AIMIM) द्वारा वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सनवर पटेल के सामाजिक बहिष्कार की अपील इस विवाद को वैचारिक असहमति से आगे सामाजिक विभाजन की ओर ले जाने वाली पहल के रूप में देखी जा सकती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी कानून, नीति या नियुक्ति का विरोध करना प्रत्येक नागरिक और राजनीतिक दल का अधिकार है। वक्फ संशोधन अधिनियम का समर्थन हो या विरोध, दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें रख सकते हैं। न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है, जनमत तैयार किया जा सकता है और शांतिपूर्ण आंदोलन भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। लेकिन किसी व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार करने की सार्वजनिक अपील लोकतांत्रिक संवाद की स्वस्थ परंपरा से मेल नहीं खाती।
सामाजिक बहिष्कार भारतीय समाज में लंबे समय से एक कठोर सामाजिक दंड माना जाता रहा है। आधुनिक लोकतंत्र में असहमति का उत्तर बहिष्कार नहीं, बल्कि संवाद, तर्क और संवैधानिक प्रक्रिया होनी चाहिए। यदि किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के निर्णय से असहमति है, तो उसकी आलोचना की जा सकती है, राजनीतिक विरोध दर्ज कराया जा सकता है, लेकिन व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों को निशाना बनाना समाज में कटुता बढ़ाने का जोखिम पैदा करता है।
यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति का मुद्दा फिलहाल कानूनी और नीतिगत बहस का विषय है। इसके पक्ष और विपक्ष में अलग-अलग मत हैं। ऐसे में किसी भी पक्ष को अपने विरोध को इस सीमा तक नहीं ले जाना चाहिए कि सामाजिक सौहार्द प्रभावित होने लगे।
राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी केवल अपने समर्थकों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करना नहीं, बल्कि समाज में संतुलन और संयम बनाए रखना भी है। मतभेद लोकतंत्र की ताकत हैं, लेकिन यदि वे सामाजिक बहिष्कार और ध्रुवीकरण में बदलने लगें तो नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है। लोकतंत्र की असली शक्ति विरोध में भी संवाद बनाए रखने में है, न कि संवाद के दरवाजे बंद करने में।


