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    मप्र को 1268 करोड़ की बचत, तो कांग्रेस का विरोध किसलिए?

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    सरदार सरोवर परियोजना को लेकर मध्य प्रदेश और गुजरात के बीच वर्षों से लंबित वित्तीय विवाद का समाधान अब राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। राज्य सरकार का दावा है कि नए समझौते के कारण प्रदेश को 1268 करोड़ रुपये की बचत हुई है। यदि यह दावा सही है, तो स्वाभाविक रूप से एक सवाल उठता है—आखिर कांग्रेस इसका विरोध किसलिए कर रही है?

    सरकार के अनुसार, अटॉर्नी जनरल के सुझाव के आधार पर मध्य प्रदेश पर लगभग 1500 करोड़ रुपये की देनदारी बन रही थी। लेकिन चार राज्यों के बीच हुए नए समझौते के बाद यह राशि घटकर 231.80 करोड़ रुपये रह गई। यानी प्रदेश के खजाने पर पड़ने वाला संभावित बोझ काफी कम हो गया। किसी भी राज्य सरकार के लिए यह वित्तीय दृष्टि से राहत की बात मानी जाएगी।

    इसके बावजूद कांग्रेस इस समझौते को प्रदेश के हितों के साथ समझौता बता रही है। विपक्ष का तर्क है कि जिस मध्य प्रदेश ने अपनी जमीन, जंगल और हजारों परिवारों के विस्थापन की कीमत चुकाई, उसे किसी भी प्रकार का भुगतान नहीं करना चाहिए था। यह राजनीतिक दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन तब यह भी अपेक्षित है कि कांग्रेस बताए कि यदि वह सत्ता में होती तो इस विवाद का समाधान किस तरह करती और क्या वह 231 करोड़ रुपये से भी कम या शून्य भुगतान सुनिश्चित करा सकती थी।

    विपक्ष की भूमिका केवल विरोध करना नहीं, बल्कि बेहतर विकल्प प्रस्तुत करना भी है। यदि सरकार का दावा तथ्यात्मक रूप से गलत है, तो कांग्रेस को दस्तावेजों और कानूनी आधार पर उसे चुनौती देनी चाहिए। लेकिन यदि वास्तव में 1500 करोड़ रुपये की संभावित देनदारी को घटाकर 231 करोड़ रुपये किया गया है, तो केवल राजनीतिक आरोपों से जनता संतुष्ट नहीं होगी।

    लोकतंत्र में सरकार की उपलब्धियों की जांच होना आवश्यक है, लेकिन उपलब्धि को केवल इसलिए नकार देना कि वह राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की है, स्वस्थ राजनीति नहीं कही जा सकती। दूसरी ओर, सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह पूरे समझौते, उसकी शर्तों और वित्तीय गणना को सार्वजनिक करे ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे।

    अंततः मुद्दा भाजपा या कांग्रेस का नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के हित का है। यदि प्रदेश को वास्तव में 1268 करोड़ रुपये का लाभ हुआ है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। और यदि इस दावे में कोई तथ्यात्मक कमी है, तो उसे प्रमाण सहित सामने लाना विपक्ष का दायित्व है। लोकतंत्र में सबसे मजबूत पक्ष वही होता है, जिसके साथ तथ्य और पारदर्शिता दोनों हों।

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