मध्य प्रदेश सरकार ने 13 नगर निगमों में 108 एल्डरमैन (नामनिर्दिष्ट पार्षद) नियुक्त कर दिए हैं। इसे सरकार ने स्थानीय निकायों की कार्यप्रणाली को मजबूत करने की प्रक्रिया बताया है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह कदम आगामी नगरीय निकाय चुनावों से पहले संगठन को साधने और लंबे समय से उपेक्षित कार्यकर्ताओं को सम्मानजनक भूमिका देने की रणनीति अधिक प्रतीत होता है। भाजपा के भीतर वर्षों से सक्रिय ऐसे अनेक नेता और कार्यकर्ता थे, जिन्हें चुनाव में टिकट नहीं मिला या जिन्हें किसी पद पर समायोजित नहीं किया जा सका। एल्डरमैन की नियुक्ति ने ऐसे लोगों को संगठन से जोड़े रखने का रास्ता खोल दिया है।
एल्डरमैन के अधिकार सीमित हैं। वे न तो विकास कार्यों के लिए बजट स्वीकृत कर सकते हैं और न ही किसी वित्तीय निर्णय पर अंतिम अधिकार रखते हैं। उनकी भूमिका परिषद की बैठकों में भाग लेने, जनहित के मुद्दे उठाने और चर्चा में अपने सुझाव देने तक सीमित है। यानी उनके पास प्रभाव तो होगा, लेकिन प्रशासनिक शक्ति नहीं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि सरकार ने इतनी बड़ी संख्या में नियुक्तियां क्यों कीं।
इसका उत्तर राजनीतिक परिस्थितियों में छिपा है। भोपाल नगर निगम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां भाजपा के 62 निर्वाचित पार्षद पहले से हैं और अब 12 एल्डरमैन भी पार्टी से जुड़े हैं। इससे परिषद में भाजपा का संख्यात्मक और राजनीतिक प्रभाव और मजबूत होगा। यह केवल परिषद की बैठकों तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर संदेश देने का माध्यम भी है कि पार्टी अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को भूलेगी नहीं।
हालांकि, यह भी सच है कि वर्तमान नगर निगम परिषद का कार्यकाल अब लगभग एक वर्ष ही शेष है। चुनाव से पहले आचार संहिता लागू होने के कारण एल्डरमैन के पास सक्रिय भूमिका निभाने के लिए सीमित समय रहेगा। ऐसे में उनके पास कोई बड़ा विकासात्मक योगदान देने का अवसर भी नहीं होगा। इससे यह धारणा और मजबूत होती है कि इन नियुक्तियों का उद्देश्य प्रशासनिक से अधिक राजनीतिक है।
लोकतंत्र में राजनीतिक समायोजन कोई नई बात नहीं है। हर दल अपने कार्यकर्ताओं को प्रेरित और सक्रिय बनाए रखने के लिए विभिन्न अवसर उपलब्ध कराता है। लेकिन जब ऐसे पदों का सृजन या उपयोग केवल संगठनात्मक संतुलन तक सीमित रह जाए और जनता की अपेक्षाएं पीछे छूट जाएं, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर जनता यह जानना चाहेगी कि जिन लोगों को परिषद में स्थान मिला है, वे शहर की समस्याओं के समाधान में कितनी प्रभावी भूमिका निभाएंगे।
सरकार के सामने चुनौती केवल अपने कार्यकर्ताओं को संतुष्ट करने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की भी है कि एल्डरमैन की संस्था लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करेगी। यदि नामनिर्दिष्ट पार्षद जनता और परिषद के बीच एक प्रभावी सेतु बनते हैं, तो यह व्यवस्था सार्थक होगी। लेकिन यदि वे केवल राजनीतिक पुरस्कार का प्रतीक बनकर रह गए, तो यह नियुक्तियां स्थानीय लोकतंत्र की मजबूती के बजाय राजनीतिक प्रबंधन का उदाहरण बनकर रह जाएंगी। आगामी नगरीय निकाय चुनावों से पहले यह फैसला सत्ता और संगठन, दोनों की प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से सामने लाता है।


