– महेश दीक्षित
राजनीति में कई बार विरोध का सबसे तीखा स्वर मंच से नहीं, बल्कि मौन से निकलता है। एक चिट्ठी, एक टिप्पणी या एक सार्वजनिक असहमति कई बार उन सवालों को जन्म दे देती है, जिन्हें लंबे समय तक सत्ता के गलियारों में दबाकर रखा गया हो। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को लिखी चिट्ठी भी ऐसी ही एक राजनीतिक घटना है। यह केवल इंदौर के मास्टर प्लान, तबादलों या प्रशासनिक हस्तक्षेप की शिकायत नहीं है, बल्कि सत्ता के शीर्ष पर उभरती उस बेचैनी का दस्तावेज है, जिसे अब छिपा पाना आसान नहीं रह गया है।
जब सरकार का सबसे वरिष्ठ और प्रभावशाली मंत्री यह कहने को विवश हो जाए कि उसे अपने ही विभाग में लगातार ‘उपेक्षा, असहयोग और हस्तक्षेप’ का सामना करना पड़ रहा है, तो सवाल केवल प्रशासनिक नहीं रह जाता। यह सीधे-सीधे नेतृत्व की कार्यशैली, संवाद और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि यदि एक वरिष्ठ मंत्री की यह स्थिति है, तो बाकी मंत्रियों और नेताओं की मनःस्थिति क्या होगी?
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार को दो साल से अधिक का समय हो चुका है। इस दौरान यह धारणा लगातार मजबूत हुई है कि सत्ता का संचालन पहले की तुलना में अधिक केंद्रीकृत हुआ है। निर्णय लेने की प्रक्रिया में पुराने और अनुभवी नेताओं की भूमिका पहले जैसी प्रभावी नहीं रह गई है। भाजपा जैसे अनुशासित संगठन में मतभेद प्रायः सार्वजनिक नहीं होते, इसलिए जब वे चिट्ठियों के माध्यम से बाहर आने लगें तो उन्हें सामान्य घटनाक्रम मान लेना राजनीतिक भूल होगी।
वास्तव में यह विवाद किसी एक मंत्री और मुख्यमंत्री के बीच नहीं है। इसके पीछे सत्ता परिवर्तन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों की पूरी कहानी छिपी है। वर्षों तक मप्र भाजपा की राजनीति जिन नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही-शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रह्लाद सिंह पटेल और कैलाश विजयवर्गीय-वे आज नई सत्ता संरचना में स्वयं को असहज और पहले जैसी निर्णायक भूमिका में नहीं देख पा रहे हैं। यह कहना समुचित नहीं होगा कि ये सभी मुख्यमंत्री के विरोध में हैं, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि बदलते सत्ता-संतुलन ने पुराने शक्ति-केंद्रों के भीतर असहजता अवश्य पैदा की है।
राजनीति में सम्मान केवल पद से नहीं मिलता, बल्कि सहभागिता से मिलता है। यदि अनुभवी नेताओं को यह महसूस होने लगे कि उनकी सलाह, अनुभव और राजनीतिक हैसियत को अपेक्षित महत्व नहीं दिया जा रहा, तो असंतोष का जन्म होना स्वाभाविक है। यही असंतोष यदि समय रहते संवाद से दूर न किया जाए तो वह धीरे-धीरे संगठनात्मक चुनौती का रूप ले सकता है।
यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब मुख्यमंत्री पहले से ही उज्जैन भूमि प्रकरण को लेकर विपक्ष के निशाने पर हैं। ऐसे समय सरकार के भीतर से उठा असंतोष विपक्ष को राजनीतिक अवसर देता है और सरकार की छवि पर भी प्रश्न खड़े करता है। सत्ता के लिए बाहरी हमला उतना खतरनाक नहीं होता, जितना भीतर से उठता अविश्वास।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष का जवाब देना नहीं, बल्कि अपने ही सहयोगियों का विश्वास बनाए रखना है। सफल नेतृत्व वही माना जाता है, जो केवल प्रशासन नहीं चलाता, बल्कि साथ चलने वालों को सम्मान और भरोसा भी देता है। सरकार बहुमत से बन सकती है, लेकिन प्रभावी शासन केवल सामूहिक नेतृत्व और निरंतर संवाद से ही संभव होता है।
कैलाश विजयवर्गीय की चिट्ठी ने एक ऐसा दर्पण मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव के सामने रख दिया है, जिसमें केवल विपक्ष के आरोप नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर पनप रहे असंतोष के विद्रूप चेहरे दिखाई और असंतुष्टोंं द्वारा रची जा रही मौन क्रांति के स्वर साफ सुनाई देने लगे हैं। अब यह मुख्यमंत्री और भाजपा नेतृत्व पर निर्भर है कि वे इस दर्पण को अनदेखा करते हैं या उसमें दिख रही सच्चाई को स्वीकार कर समय रहते संवाद और संतुलन की नई शुरुआत करते हैं। क्योंकि राजनीति का इतिहास गवाह है कि सत्ता को सबसे गहरी चोट विपक्ष नहीं, अपने ही शिविर की मौन नाराजगी पहुंचाती है। यही मौन, यदि लंबे समय तक अनसुना रह जाए, तो वह अंततः सबसे बड़ा राजनीतिक बखेड़ा बन जाता है।
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