-महेश दीक्षित
इतना तो तय है कि, दतिया उपचुनाव अब केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह भाजपा के भीतर शक्ति, प्रभाव और भविष्य के नेतृत्व की अग्निपरीक्षा परीक्षा बन चुका है। मतपत्र पर भले ही आशुतोष तिवारी और घनश्याम सिंह के नाम हों, लेकिन असली मुकाबला उन राजनीतिक संदेशों का है, जो भाजपा अपने कद्दावर नेताओं को देना चाहती है।
राजनीति में संयोग कम और संकेत ज्यादा होते हैं। डॉ. नरोत्तम मिश्रा जैसा छह बार का विधायक, पूर्व गृहमंत्री और वर्षों तक पार्टी का संकटमोचक रहा नेता अचानक चुनावी तस्वीर से बाहर हो जाए, फिर उसी सीट की कमान बतौर चुनाव प्रभारी सीधे श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दी जाए, तो इसे महज संगठनात्मक व्यवस्था मानना राजनीतिक बेमानी होगी। भाजपा ने इस फैसले से एक साथ कई तीर चलाए हैं। पहला, संगठन व्यक्ति से बड़ा है। दूसरा, पार्टी का भविष्य अब नए शक्ति-केंद्रों के इर्द-गिर्द गढ़ा जाएगा। तीसरा, ग्वालियर-चंबल की राजनीति में अंतिम राजनीतिक मुहर अब किसकी होगी, इसका उत्तर दतिया से निकलेगा।
डॉ. नरोत्तम मिश्रा उन नेताओं में रहे हैं जिन्होंने अपने राजनीतिक कौशल और जनाधार के दम पर अलग पहचान बनाई। कई बार ऐसा भी माना गया कि वे क्षेत्रीय राजनीति में इतने प्रभावशाली हो गए थे कि उनकी स्वतंत्र राजनीतिक हैसियत स्वयं एक शक्ति-केंद्र बन गई। राजनीति में ऐसे कद वाले नेताओं से मित्र कम और असहज प्रतिद्वंद्वी अधिक पैदा हो जाते हैं। शायद यही कारण है कि दतिया का यह चुनाव केवल कांग्रेस को हराने का अभियान नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर नई राजनीतिक रेखाएं खींचने का प्रयास भी है।
यदि भाजपा ‘दतिया’ जीतती है तो सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ आशुतोष तिवारी से अधिक ज्योतिरादित्य सिंधिया के खाते में जाएगा। तब यह स्थापित करने की कोशिश होगी कि ग्वालियर-चंबल में चुनाव जिताने की सबसे प्रभावी क्षमता अब श्रीमंत के पास है। इसका असर केवल दतिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन नेताओं की राजनीतिक प्रासंगिकता पर भी पड़ेगा, जो अब तक क्षेत्रीय राजनीति में समानांतर प्रभाव रखते आए हैं। जिन्हें श्रीमंत खटकते रहे हैं। लेकिन राजनीति का दूसरा नियम भी उतना ही कठोर है। जिसे श्रेय मिलता है, जवाबदेही भी उसी के हिस्से आती है। यदि भाजपा यह चुनाव हारती है तो सवाल केवल उम्मीदवार पर नहीं उठेंगे। तब यह पूछा जाएगा कि क्या अनुभवी नेतृत्व की उपेक्षा संगठनात्मक प्रयोग से भारी पड़ गई? क्या जनाधार को केवल रणनीति से प्रतिस्थापित किया जा सकता है?
खैर, 30 जुलाई का फैसला केवल दतिया का विधायक नहीं चुनेगा। यह तय करेगा कि भाजपा में भविष्य का राजनीतिक सूरज किस दिशा से उगेगा और ग्वालियर-चंबल की राजनीति में किसका प्रभाव स्थायी माना जाएगा। दतिया का जनादेश शायद एक सीट का परिणाम होगा, लेकिन उसकी गूंज भोपाल से दिल्ली तक सत्ता और संगठन के गलियारों में सुनाई देगी।


