भोपाल/नई दिल्ली। शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी)को लेकर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि बच्चों के भविष्य से समझौता नहीं किया जा सकता। शिक्षकों को टीईटी पास करना अनिवार्य है। अब मप्र के डेढ़ लाख से ज्यादा शिक्षकों को टीईटी देनी ही पड़ेगी। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दायर रिव्यू पिटीशनों पर फैसला सुनाते हुए कहा कि बच्चों के बेहतर शैक्षणिक विकास के लिए शिक्षकों का पात्रता परीक्षा पास करना जरूरी है। हालांकि कोर्ट ने राहत देते हुए परीक्षा पास करने की समय-सीमा 2 साल से बढ़ाकर 3 साल कर दी है। अब शिक्षकों को 31 अगस्त 2028 तक टीईटी पास करने का मौका मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट मामले में सेवा में कार्यरत शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य रखने का फैसला बरकरार रखा। इससे पहले 1 सितंबर 2025 के आदेश में कोर्ट ने दो साल के भीतर पात्रता परीक्षा पास करने को कहा था। अब इसमें एक साल की अतिरिक्त मोहलत दी गई है।
इधर, फैसले के बाद शिक्षक संगठनों ने नाराजगी जताई है। ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष डीके सिंगोर ने कहा कि संगठन आदेश की समीक्षा कर रहा है। उनका कहना है कि पुराने शिक्षकों पर टीईटी की अनिवार्यता सेवा अधिकारों के साथ अन्याय है। अध्यापक शिक्षक संयुक्त मोर्चा ने भी फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि वह इस मुद्दे पर संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई जारी रखेगा। मोर्चा ने आरटीई एक्ट में संशोधन की मांग के साथ क्यूरेटिव याचिका दायर करने की बात भी कही है।


