भोपाल/नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद पार्टी ने चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देते हुए दिल्ली में आयोग से मुलाकात की है। वहीं राज्यसभा प्रत्याशियों की अंतिम सूची में भाजपा उम्मीदवार तरुण चुग, महेश केवट और रजनीश अग्रवाल के नाम शामिल किए गए हैं।
भोपाल स्थित रिटर्निंग ऑफिसर कार्यालय द्वारा जारी अंतिम सूची में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नाम शामिल नहीं किया गया। उनका नामांकन 9 जून को कथित रूप से शपथ पत्र में अनियमितताओं के आधार पर निरस्त कर दिया गया था। कांग्रेस का आरोप है कि यह फैसला कानून और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
नई दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के प्रतिनिधिमंडल ने निर्वाचन आयोग से मुलाकात कर नामांकन निरस्त किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराई। प्रतिनिधिमंडल में अभिषेक मनु सिंघवी, केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, रणदीप सिंह सुरजेवाला, सचिन पायलट, भूपेश बघेल और विवेक तन्खा सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल रहे।
कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि जिस आधार पर नामांकन खारिज किया गया है, उसका चुनावी कानून में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। उन्होंने दावा किया कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ ऐसा कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं था, जिसका उल्लेख शपथ पत्र में करना अनिवार्य हो। इधर भोपाल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि राज्यसभा सीट को राजनीतिक दबाव के जरिए कांग्रेस से छीना गया है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि राज्यसभा सीट को बचाने के लिए पार्टी का संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने घोषणा की कि कांग्रेस विधायक जल्द ही दिल्ली जाकर राष्ट्रपति से मुलाकात करेंगे और राष्ट्रपति भवन तक मार्च निकालेंगे। वहीं भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि नामांकन प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुसार हुई है। भाजपा का दावा है कि नामांकन पत्र में आवश्यक जानकारी नहीं दिए जाने के कारण कार्रवाई की गई।
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस घटनाक्रम को लोकतंत्र के लिए चिंताजनक बताते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अब सभी की नजरें चुनाव आयोग के अंतिम रुख और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हैं, जिससे राज्यसभा चुनाव का यह विवाद और अधिक राजनीतिक महत्व हासिल कर गया है।


