वाशिंगटन। world map change: बचपन से किताबों, टीवी और इंटरनेट पर हम दुनिया का जो नक्शा देखते आए हैं, उसमें कई देशों और महाद्वीपों का आकार उनके वास्तविक क्षेत्रफल से काफी अलग दिखाई देता है। अब इस तस्वीर को बदलने की कोशिश तेज हो गई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को एक प्रस्ताव पर वोटिंग होनी है, जिसमें दुनिया का ऐसा नक्शा अपनाने की बात कही गई है, जो देशों और महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सटीक तरीके से दर्शाए।
अगर प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो नक्शे पर दुनिया की तस्वीर काफी बदल जाएगी। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका अपेक्षाकृत बड़े दिखाई देंगे, जबकि ग्रीनलैंड, यूरोप और कनाडा मौजूदा नक्शे की तुलना में छोटे नजर आएंगे। हालांकि, जमीन पर किसी देश या महाद्वीप का आकार बिल्कुल नहीं बदलेगा। बदलाव केवल उसे नक्शे पर प्रदर्शित करने के तरीके में होगा।
आखिर मौजूदा विश्व नक्शे में समस्या क्या है?
दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले नक्शों में मर्केटर प्रोजेक्शन प्रमुख है। यूरोपीय मानचित्रकार जेरार्डस मर्केटर ने इसे 1569 में तैयार किया था। समुद्री यात्राओं और नेविगेशन के लिए यह नक्शा बेहद उपयोगी साबित हुआ, लेकिन पृथ्वी जैसे गोल आकार को सपाट सतह पर दिखाने की वजह से इसमें कई क्षेत्रों का वास्तविक आकार बिगड़ जाता है।
मर्केटर प्रोजेक्शन में भूमध्य रेखा से दूर जाने वाले क्षेत्र नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं। यही कारण है कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के करीब स्थित कई देश और क्षेत्र वास्तविकता की तुलना में काफी विशाल नजर आते हैं।
ग्रीनलैंड सबसे बड़ा उदाहरण
ग्रीनलैंड इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड दक्षिण अमेरिका के लगभग बराबर दिखाई दे सकता है, जबकि वास्तविकता में दोनों के क्षेत्रफल में बहुत बड़ा अंतर है।
ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो लगभग डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के बराबर है। इसके मुकाबले अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना बड़ा है।
इसके बावजूद पारंपरिक नक्शे को देखकर दोनों का आकार काफी हद तक समान दिखाई दे सकता है। इसी अंतर को कम करने की कोशिश अब नए नक्शे के जरिए की जा रही है।
अफ्रीकी देशों की आपत्ति क्या है?
अफ्रीकी देशों का कहना है कि मामला सिर्फ नक्शे पर किसी महाद्वीप के छोटा या बड़ा दिखने तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक इस्तेमाल होने वाला नक्शा दुनिया के अलग-अलग हिस्सों को देखने और समझने की हमारी धारणा को भी प्रभावित करता है।
अफ्रीकी देशों का तर्क है कि मर्केटर नक्शे में अफ्रीका अपने वास्तविक आकार की तुलना में काफी छोटा नजर आता है। इससे लोगों के मन में अफ्रीका के क्षेत्रफल, संसाधनों और वैश्विक महत्व को लेकर गलत धारणा बन सकती है।
प्रस्ताव में लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि नक्शे पर इन क्षेत्रों का अपेक्षाकृत छोटा दिखाई देना उनकी विकास क्षमता, बुनियादी ढांचे और आर्थिक महत्व को कम आंकने वाली धारणा को बढ़ावा दे सकता है।
‘Correct the Map’ से बदलने की कोशिश
संयुक्त राष्ट्र महासभा के सामने रखे गए प्रस्ताव को ‘Correct the Map’ नाम दिया गया है। इसे अफ्रीकी संघ के सदस्य देशों और बहामास ने आगे बढ़ाया है।
प्रस्ताव में मर्केटर प्रोजेक्शन के बजाय ऐसे नक्शों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात कही गई है, जिनमें दुनिया के विभिन्न हिस्सों का क्षेत्रफल वास्तविकता के ज्यादा करीब दिखाई दे।
इनमें ‘Equal Earth’ प्रोजेक्शन को खास महत्व दिया जा रहा है। इसे 2018 में पेश किया गया था। इसका उद्देश्य पृथ्वी के विभिन्न देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल को ज्यादा संतुलित तरीके से प्रदर्शित करना है।
नए नक्शे में क्या-क्या बदलेगा?
नए प्रोजेक्शन में अंतर पहली नजर में दिखाई देता है।
- अफ्रीका मौजूदा नक्शे की तुलना में काफी बड़ा दिखाई देगा।
- दक्षिण अमेरिका और ब्राजील का वास्तविक आकार ज्यादा स्पष्ट नजर आएगा।
- ग्रीनलैंड काफी छोटा दिखाई देगा।
- यूरोप भी पारंपरिक मर्केटर नक्शे की तुलना में छोटा नजर आएगा।
- कनाडा और रूस जैसे उत्तरी हिस्सों का आकार भी मौजूदा नक्शे से अलग दिखाई देगा।
यानी बदलाव धरती पर नहीं, बल्कि दुनिया को नक्शे पर देखने के नजरिए में होगा।


