बीजिंग/प्योंगयांग। उत्तर कोरिया को लेकर पूर्वी एशिया में कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 8 से 9 जून के बीच उत्तर कोरिया का दौरा करेंगे और किम जोंग उन से मुलाकात करेंगे। यह उनकी 2019 के बाद पहली प्योंगयांग यात्रा होगी।
यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद उत्तर कोरिया और रूस के बीच सहयोग तेजी से बढ़ा है। माना जा रहा है कि इस बदलाव ने क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित किया है, जहां अब उत्तर कोरिया केवल चीन पर निर्भर नहीं रहा।
चीन-उत्तर कोरिया संबंधों की अहम साझेदारी
चीन उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक और राजनीतिक साझेदार बना हुआ है। दोनों देशों के बीच 1,400 किलोमीटर लंबी सीमा और एक रक्षा संधि भी है, जो चीन की किसी देश के साथ एकमात्र सैन्य संधि मानी जाती है। इस वर्ष इस समझौते के 65 साल पूरे हो रहे हैं।
किम जोंग उन के लिए अहम कूटनीतिक अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा किम जोंग उन के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका है। कोरोना महामारी और वैश्विक प्रतिबंधों के बीच उत्तर कोरिया खुद को अधिक आत्मनिर्भर और मजबूत देश के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है।
पुतिन-किम की बढ़ती नजदीकी से चीन की चिंता
पिछले कुछ वर्षों में रूस और उत्तर कोरिया के बीच सैन्य और आर्थिक सहयोग बढ़ा है। रूस ने उत्तर कोरिया को मदद दी है, जबकि प्योंगयांग ने यूक्रेन युद्ध में मॉस्को को समर्थन दिया है। इस बढ़ती साझेदारी ने चीन की रणनीतिक चिंता बढ़ा दी है।
चीन का प्रभाव बनाए रखने की कोशिश
विश्लेषकों का कहना है कि शी जिनपिंग की यह यात्रा उत्तर कोरिया पर चीन के प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है। साथ ही किम जोंग उन भी अब चीन पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते और रूस के साथ संबंधों का लाभ उठाकर अधिक रियायतें हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।


