पेरिस/लंदन/मैड्रिड। यूरोप इस समय रिकॉर्डतोड़ हीटवेव की चपेट में है। महाद्वीप के 26 देशों में भीषण गर्मी ने जनजीवन को प्रभावित कर दिया है। फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, जर्मनी, बेल्जियम और इटली समेत 15 देशों में गर्मी को लेकर हाई अलर्ट जारी किया गया है। कई क्षेत्रों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचने की आशंका जताई गई है।
फ्रांस में हालात सबसे अधिक गंभीर बने हुए हैं। देश के आधे से ज्यादा हिस्से में रेड अलर्ट लागू कर दिया गया है। फ्रांसीसी मौसम एजेंसी के अनुसार, सोमवार रात 1947 के बाद की सबसे गर्म रात दर्ज की गई। कई इलाकों में तापमान 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। भीषण गर्मी के चलते गोलफेश न्यूक्लियर पावर प्लांट को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा, क्योंकि इसे ठंडा करने वाली गारोन नदी का तापमान खतरनाक स्तर तक पहुंचने की संभावना थी।
गर्मी से राहत पाने के लिए नदियों, झीलों और नहरों में उतरने वाले लोगों के लिए भी खतरा बढ़ गया है। फ्रांस के प्रधानमंत्री के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में 40 से अधिक लोगों की डूबने से मौत हो चुकी है। इनमें बड़ी संख्या युवाओं की है। इसके अलावा, 1,350 से ज्यादा स्कूलों को बंद करना पड़ा है।
सरकार ने स्वास्थ्य जोखिम को देखते हुए देश के प्रसिद्ध वार्षिक संगीत महोत्सव ‘फेत द ला म्यूजिक’ के दौरान सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। अधिकारियों का मानना है कि अत्यधिक गर्मी के बीच शराब का सेवन लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
ब्रिटेन में भी मौसम विभाग ने रेड एक्सट्रीम हीट वॉर्निंग जारी की है। अनुमान है कि तापमान 39 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जा सकता है, जिससे जून महीने का लगभग 50 वर्ष पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड टूट सकता है। मौसम विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अधिक नमी के कारण गर्मी का असर और ज्यादा महसूस होगा।
स्पेन, जर्मनी, बेल्जियम और इटली में भी हालात चिंताजनक हैं। स्पेन के कई क्षेत्रों में रात का तापमान भी 30 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं जा रहा है। जर्मनी में नदी और झीलों में नहाने के दौरान कई लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं बेल्जियम इसे अपने इतिहास की सबसे गंभीर हीटवेव मान रहा है। इटली के रोम और मिलान समेत 15 शहरों में रेड अलर्ट जारी किया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस असामान्य गर्मी की प्रमुख वजह ‘हीट डोम’ और ‘ओमेगा ब्लॉक’ जैसी मौसमीय परिस्थितियां हैं। इनकी वजह से गर्म हवा लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में फंसी रहती है और तापमान लगातार बढ़ता रहता है। वैज्ञानिक मौजूदा हालात की तुलना वर्ष 2003 की विनाशकारी यूरोपीय हीटवेव से कर रहे हैं, जिसमें लगभग 80 हजार लोगों की जान चली गई थी।
यूरोप में बढ़ती गर्मी ने जलवायु परिवर्तन के खतरों को एक बार फिर दुनिया के सामने उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसी चरम मौसमीय घटनाओं की आवृत्ति बढ़ती रही, तो आने वाले वर्षों में इसके सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव और अधिक गंभीर हो सकते हैं।


