जैसा बोओगे, वैसा काटोगे जीवन में प्रचलित एक सामान्य कहावत है। इसका अर्थ है व्यक्ति जैसा कर्म करता है, वैसा ही वह फल पाता है। शास्त्र कहते हैं कि व्यक्ति के अच्छे या बुरे कर्मों के अनुसार भगवान उसे पुरस्कार या दंड देते हैं।
‘कर्म’ शब्द का अर्थ है मानव क्रिया या कार्य। हम निरंतर शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से कर्म करते रहते हैं। किसी व्यक्ति के कर्म ही उसके जीवन में अच्छे या बुरे परिणामों के लिए जिम्मेदार होते हैं। इस संसार में कुछ भी आकस्मिक या संयोगवश नहीं होता; हर घटना के पीछे कोई न कोई कारण होता है, भले ही वह उस समय हमें स्पष्ट न हो। अच्छे कर्म सुख उत्पन्न करते हैं और बुरे कर्म दु:ख तथा कष्ट का कारण बनते हैं, चाहे वह वर्तमान जीवन में हो या अगले जन्म में। व्यक्ति के पूर्व कर्म उसके वर्तमान को प्रभावित करते हैं और वर्तमान कर्म उसके भविष्य को निर्धारित करते हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति कुछ हद तक अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है।
हमारे सभी कर्म दो प्रकार से किए जाते हैं। निष्काम कर्म यानी जब कर्म बिना किसी भौतिक लाभ, अहंकार रहित या बिना किसी सांसारिक इच्छा की अपेक्षा के किए जाते हैं। ऐसे कर्म केवल अपने कर्तव्यों का पालन करने और भगवान को प्रसन्न करने के लिए किए जाते हैं। सकाम कर्म जब कर्म किसी भौतिक इच्छा, लाभ या उद्देश्य की अपेक्षा से किए जाते हैं।
भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि इस बात पर विशेष बल दिया कि साधक की केवल एक ही इच्छा होनी चाहिए-भगवान को प्रसन्न करना, चाहे वह निष्काम कर्म ही क्यों न कर रहा हो।
हिंदू धर्म में कर्म के तीन प्रकार
1. क्रियमाण कर्म-ये वे कर्म हैं जो हम प्रत्येक क्षण करते रहते हैं। इन कर्मों के फल इस जीवन में, अगले जीवन में या अनेक जन्मों के बाद प्राप्त हो सकते हैं।
2. संचित कर्म- यह अनेक जन्मों में किए गए सभी कर्मों का संचित भंडार है। इनके फल या तो भोगे जा चुके हैं या भविष्य में भोगे जाने बाकी हैं।
3. प्रारब्ध कर्म – यह संचित कर्म का वह भाग है जिसका फल वर्तमान जन्म में अनुभव किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, व्यक्ति का शारीरिक स्वरूप, उसकी मानसिक क्षमताएँ तथा जीवन की परिस्थितियाँ उसके प्रारब्ध कर्मों का परिणाम हैं।
भगवान ने प्रत्येक व्यक्ति को कर्म करने की स्वतंत्रता दी है। इसलिए व्यक्ति अपने ऐसे कर्मों के लिए स्वयं जिम्मेदार है जो पुण्य या पाप उत्पन्न करते हैं। साथ ही, भगवान ही कर्मों के फलों के दाता हैं। जब वे उचित समझते हैं, तभी व्यक्ति अपने अच्छे या बुरे कर्मों के परिणामों का अनुभव करता है। कर्म का सिद्धांत कोई स्वचालित व्यवस्था नहीं है जिसमें कर्म अपने-आप फल दे देते हों, क्योंकि कर्म स्वयं जड़ (निर्जीव) हैं। केवल भगवान की इच्छा से ही उनके फल प्राप्त होते हैं।
धर्म क्या है?
धर्म जीवन की आधारशिला है। यह नैतिक नियमों और आध्यात्मिक अनुशासन का ऐसा समन्वय है जो व्यक्ति के जीवन का मार्गदर्शन करता है। धर्म का अर्थ है वह जो धारण करता है। अर्थात् इस संसार के लोगों और समस्त सृष्टि को स्थिर बनाए रखने वाला तत्व धर्म ही है। धर्म एक व्यापक शब्द है, जिसका अर्थ धार्मिकता, नैतिकता, आस्था, जिम्मेदारी और कर्तव्य से है। धर्म में धार्मिक नियमों और कर्तव्यों का पालन शामिल है, जैसे-सत्यनिष्ठा, ब्रह्मचर्य और अहिंसा। धर्म का उद्देश्य केवल जीवात्मा को भगवान के निकट लाना ही नहीं है, बल्कि ऐसा आचरण निर्धारित करना भी है जो सांसारिक सुख और शाश्वत आनंद दोनों को सुनिश्चित करे। धर्म का पालन व्यक्ति को आंतरिक सुख, शक्ति और शांति का अनुभव कराता है तथा उसके जीवन को अनुशासित और संतुलित बनाता है।


