मासिक धर्म को लेकर मंदिर जाने और पूजा करने की परंपरागत मान्यताएं लंबे समय से समाज में रही हैं। अक्सर यह कहा जाता था कि मासिक धर्म के दौरान महिलाएं मंदिर या पूजा-पाठ से दूर रहें, इसे ‘अशुद्धता’ से जोड़ा जाता था। लेकिन कई विद्वानों का मानना है कि यह नियम सीधे धार्मिक ग्रंथों से नहीं, बल्कि सामाजिक परंपराओं से जुड़ा है।
तीर्थयात्रा में मासिक धर्म क्या करें?
शास्त्रों का कहना है कि अगर तीर्थ यात्रा के समय मासिक धर्म अचानक शुरू हो जाए, तो दर्शन का अवसर छोड़ना जरूरी नहीं। इस स्थिति में स्नान करके, भगवान के प्रसाद, चंदन या जल छिड़ककर श्रद्धा भाव से दूर से दर्शन किया जा सकता है। इस दौरान मंदिर की सेवा सामग्री को छूने या स्पर्श करने की आवश्यकता नहीं होती। जीवन में हर बार तीर्थ यात्रा का मौका नहीं मिल पाता, इसलिए श्रद्धा से किया गया यह दर्शन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मासिक धर्म की पौराणिक कथा
संतों के अनुसार मासिक धर्म कोई निंदनीय बात नहीं है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवताओं के राजा इंद्र ने वृत्रासुर वध के बाद ब्रह्महत्या का दोष चार हिस्सों में बांटा। उनमें से एक हिस्सा स्त्रियों ने स्वीकार किया, जिसे मासिक धर्म कहा गया। इसे किसी अशुद्धता के रूप में नहीं, बल्कि त्याग और वहन के रूप में देखा गया। इसलिए धार्मिक लाभ या सम्मान से महिलाओं को वंचित करना उचित नहीं है।
श्रद्धा और परंपरा का संतुलन
महिलाएं स्नान आदि करके स्वयं को शुद्ध कर सकती हैं और दूर से श्रद्धा भाव से दर्शन कर सकती हैं। मंदिरों में किसी वस्तु को न छूना और सेवा सामग्री अर्पित न करना परंपरा का सम्मान करते हुए संभव है। इसका मतलब यह है कि मासिक धर्म के दौरान भी महिलाएं अपनी आस्था और श्रद्धा के साथ तीर्थ यात्रा का लाभ ले सकती हैं।


