एक राजा के दरबार में विद्वानों की सभा चल रही थी। एक विद्वान भागवत पुराण में वर्णित ‘गजेन्द्र मोक्ष’ नामक रोचक कथा सुना रहे थे। वे बोले – ‘गजराज की करुण पुकार सुनते ही भगवान नारायण भागते हुए चले आये। जल्दी में वे अपना शंख और चक्र लेना भी भूल गए। यहां तक कि उन्होंने अपनी संगिनी देवी लक्ष्मी को भी सूचित नहीं किया।’
विद्वान की बात सुनते ही राजा ने उनसे प्रश्न किया – ‘स्वामी जी, कृपया मुझे यह बतलायें कि उस जगह से बैकुण्ठ कितनी दूर है जहां से हाथी ने पुकार लगायी थी?’
विद्वान ने उत्तर दिया – ‘क्षमा कीजिए, मैं इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता। ऐसे बहुत कम सौभागयशाली हैं जो इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं।’
दरबार में मौजूद बाकी सभी विद्वानों ने भी इस प्रश्न का उत्तर दे पाने में असमर्थता जतायी। अचानक राजा के पीछे खड़ा एक व्यक्ति धीरे से बोला – ‘महाराज, यदि आप मुझे अनुमति दें तो मैं इस प्रश्न का उत्तर बता सकता हूं।’ राजा की अनुमति मिलते ही वह बोला – ‘हे महाराज, उस जगह से बैकुण्ठ उतना ही दूर था जितनी दूर से उस हाथी की पुकार सुनी जा सके।’
भगवान नारायण का एक नाम ‘हृदयनिवासी’ भी है।


