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    सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: एमपी लोकायुक्त की SPE अब RTI के दायरे में, सरकार की अधिसूचना रद्द

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    नई दिल्ली। सूचना के अधिकार (RTI) कानून के तहत पारदर्शिता को बढ़ावा देने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार की उस अधिसूचना को निरस्त कर दिया है, जिसके माध्यम से लोकायुक्त के स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (SPE) को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि SPE न तो कोई खुफिया एजेंसी है और न ही सुरक्षा संगठन, इसलिए उसे सूचना के अधिकार कानून से छूट नहीं दी जा सकती।

    न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने 15 जून 2026 को सुनाए गए फैसले में कहा कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त भ्रष्टाचार तथा लोकसेवकों से जुड़े मामलों की जांच करते हैं, जिसमें SPE सहयोगी एजेंसी के रूप में कार्य करती है। हालांकि, वर्ष 1981 के मध्य प्रदेश लोकायुक्त अधिनियम के तहत SPE को खुफिया या सुरक्षा संबंधी जांच का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

    केवल खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को ही मिल सकती है छूट

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) के तहत केवल वास्तविक खुफिया और सुरक्षा संगठनों को ही सूचना देने से छूट दी जा सकती है। चूंकि SPE इस श्रेणी में नहीं आती, इसलिए उसे RTI कानून के दायरे से बाहर रखना विधि सम्मत नहीं है।

    अदालत ने यह भी माना कि राज्य सरकार द्वारा जारी की गई अधिसूचना कानून की मंशा के विपरीत थी और शक्तियों के अति प्रयोग का उदाहरण है।

    पुलिस इंस्पेक्टर के आवेदन से शुरू हुआ था विवाद

    यह मामला पुलिस इंस्पेक्टर कामता प्रसाद मिश्रा से जुड़ा है, जिन पर रिश्वत लेने के आरोप लगे थे। मिश्रा ने अपनी जांच से संबंधित कुछ दस्तावेज सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगे थे, लेकिन SPE ने वर्ष 2011 की अधिसूचना का हवाला देते हुए जानकारी देने से इंकार कर दिया।

    इसके बाद मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा, जहां दिसंबर 2021 में हाईकोर्ट ने SPE के आदेश को रद्द करते हुए मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ SPE ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।

    राज्य सरकार नहीं कर सकी दावा साबित

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 2011 की अधिसूचना की वैधता की समीक्षा की और पाया कि राज्य सरकार यह साबित करने में असफल रही कि SPE किसी प्रकार की खुफिया या सुरक्षा एजेंसी है।

    अदालत ने कहा कि SPE का गठन वर्ष 1947 के अधिनियम के तहत किया गया था और इसका कार्यक्षेत्र केवल लोकसेवकों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार, विश्वासघात और धोखाधड़ी जैसे मामलों की जांच तक सीमित है। इसका खुफिया जानकारी जुटाने या आंतरिक सुरक्षा से कोई संबंध नहीं है।

    पारदर्शिता और जवाबदेही को मिलेगा बल

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला RTI कानून की मूल भावना को और मजबूत करेगा। इससे जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी और नागरिकों को सूचना प्राप्त करने का अधिकार और अधिक प्रभावी होगा।

    साथ ही, इस फैसले के बाद कामता प्रसाद मिश्रा को उनके द्वारा मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराए जाने का रास्ता भी साफ हो गया है। यह निर्णय सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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