नई दिल्ली। देश में आर्थिक विकास और अपराध दर का सीधा संबंध है। एसबीआई रिसर्च ने 28 राज्यों के आंकड़ों का विश्लेषण किया और पाया कि जब राज्य प्रति व्यक्ति सुरक्षा खर्च में 1 प्रतिशत बढ़ोतरी करता है, तो अपराध दर लगभग 0.36 प्रतिशत घट जाती है।
रिसर्च में यह भी खुलासा हुआ कि जिन शहरों में सीसीटीवी कैमरों से अधिक इलाका कवर किया गया है, वहां अपराध दर कम है। वहीं, महिलाओं के खिलाफ अपराध जहां ज्यादा हैं, वहां उनके वर्कफोर्स में हिस्सेदारी कम पाई गई।
अपराध में गिरावट
-2024 में देश में कुल 58.86 लाख संज्ञेय अपराध दर्ज हुए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6% कम हैं।
-अखिल भारतीय अपराध दर प्रति लाख आबादी 2023 के 448.3 से घटकर 2024 में 418.9 हो गई।
-महिलाओं के खिलाफ अपराध 4.48 लाख से घटकर 4.41 लाख हुए।
राज्यवार आंकड़े और महिला श्रम बल पर असर
-केरल में प्रति लाख आबादी पर सबसे अधिक 1,389 संज्ञेय अपराध दर्ज।
-नगालैंड में सबसे कम 61.6 अपराध।
-हरियाणा, बिहार, पंजाब और बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराध राष्ट्रीय औसत (64.6) से ऊपर, जिससे महिला वर्कफोर्स पर नकारात्मक असर।
-राजस्थान अपवाद, जहां क्राइम रेट ज्यादा होने के बावजूद महिला वर्कफोर्स 50% से अधिक।
एफआईआर की कमी और आंकड़ों की असलियत
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार घरेलू हिंसा के कम से कम 5.94 लाख मामले पुलिस तक पहुंचने चाहिए थे।लेकिन एनसीआरबी में केवल 1.21 लाख मामले दर्ज। मतलब 80% मामले पुलिस रिकॉर्ड में नहीं आए।बंगाल में लापता बच्चों और हिंसक अपराधों में राष्ट्रीय हिस्सा ज्यादा, लेकिन चोरी और सेंधमारी के मामले कम दर्ज।


