दुबे ने अपने ज्ञापन में आरोप लगाया है कि मुखर्जी को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष पद पर नियुक्त करने की निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसके बावजूद उन्होंने छह जुलाई 2026 को स्वयं को बोर्ड का अध्यक्ष घोषित कर दिया और इस पद पर काम करना शुरू कर दिया।
मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव निरस्त किया, फिर भी पद पर बने रहने का आरोप
ज्ञापन के मुताबिक, सामान्य प्रशासन विभाग ने 17 जून 2026 को आदेश जारी कर अनिरुद्ध मुखर्जी को अपर मुख्य सचिव (पर्यावरण), पर्यावरण आयुक्त और महानिदेशक (ईपीसीओ) का अतिरिक्त प्रभार सौंपा था। हालांकि, इस आदेश में मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष पद का कोई उल्लेख नहीं था।
दुबे का दावा है कि छह जुलाई को मुखर्जी ने स्वयं को बोर्ड अध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत किया था। आरोप है कि मुख्यमंत्री ने निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं होने के कारण प्रस्ताव निरस्त कर दिया था। इसके बावजूद मुखर्जी ने अध्यक्ष के रूप में काम करना जारी रखा। दुबे ने इसे प्रशासनिक और वैधानिक प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन बताया है।
सर्च कमेटी और राजपत्र अधिसूचना पर उठाए सवाल
ज्ञापन में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 4(2) का हवाला दिया गया है। दुबे के अनुसार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया, सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटी और राजपत्र अधिसूचना से जुड़ी औपचारिकताओं का पालन जरूरी है। उनका आरोप है कि इन प्रक्रियाओं को अपनाए बिना ही अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला गया।
पांच महीने के फैसलों और मंजूरियों की जांच की मांग
इस विवाद में कथित पांच महीने के कार्यकाल के दौरान लिए गए फैसले भी जांच के दायरे में लाने की मांग की गई है। ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि इस अवधि में औद्योगिक इकाइयों को पर्यावरणीय सम्मतियां और अन्य अनुमतियां जारी की गईं। इसके अलावा पदोन्नति और तबादलों से जुड़े प्रशासनिक निर्णय भी लिए गए।
दुबे का कहना है कि यदि अध्यक्ष पद पर नियुक्ति वैधानिक नहीं थी तो इस दौरान जारी सभी आदेशों और स्वीकृतियों की वैधता की भी जांच होनी चाहिए।
एफआईआर, निलंबन और लोकायुक्त जांच की मांग
अजय दुबे ने कथित धोखाधड़ी, कूटरचित आचरण और पद के दुरुपयोग के आरोपों में अनिरुद्ध मुखर्जी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तारी की मांग की है। उन्होंने तत्काल निलंबन और विभागीय कार्रवाई के बाद सेवा से बर्खास्त करने की मांग भी उठाई है।
इसके साथ ही कथित कार्यकाल के दौरान हुए वित्तीय लेनदेन, प्रशासनिक फैसलों, पर्यावरणीय स्वीकृतियों और तबादलों की लोकायुक्त से निष्पक्ष जांच कराने का आग्रह किया है। फिलहाल ये आरोप ज्ञापन में लगाए गए हैं। इन पर संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आने और जांच के निष्कर्षों के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।


