मध्य प्रदेश में शराब माफिया का दुस्साहस अब इस हद तक पहुंच गया है कि कानून के रखवालों की जान भी सुरक्षित नहीं रह गई है। देवास जिले के खातेगांव में अवैध शराब तस्करी रोकने की कार्रवाई के दौरान थाना प्रभारी दिलीप पुरी को ट्रक से कुचलकर मार दिया जाना इसी खतरनाक हकीकत का प्रमाण है। यह महज एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि कानून को चुनौती देने वाले आपराधिक तंत्र की दुस्साहसिक मानसिकता का आईना है।
2 नवंबर की तड़के इंदौर-बैतूल हाईवे पर नेमावर रोड क्षेत्र में हुई इस घटना ने पूरे पुलिस महकमे को झकझोर दिया है। अवैध शराब से भरे आयशर ट्रक को रोकने पहुंचे टीआई दिलीप पुरी ने चालक को नीचे उतरने के लिए कहा, लेकिन चालक ने वाहन आगे बढ़ा दिया। ट्रक का पहिया उनके ऊपर से गुजर गया और उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। आरोपी चालक फरार हो गया। पुलिस ने कथित नेटवर्क के सरगना राहुल जायसवाल और वाहन मालिक कैरम सिंह को गिरफ्तार किया है। मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिवंगत टीआई के परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता और उनकी पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति के तहत सब-इंस्पेक्टर बनाने की घोषणा की है। सरकार की ये घोषणाएं परिवार को संबल जरूर देंगी, लेकिन क्या आर्थिक सहायता किसी जिम्मेदार अधिकारी की जान की भरपाई कर सकती है?
इस घटना का सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अपराधियों के मन से खाकी का खौफ क्यों खत्म होता जा रहा है? जिस वर्दी को देखकर अपराधियों के हौसले पस्त होने चाहिए, उसी वर्दी के अधिकारी को अपराधी वाहन से कुचलने का दुस्साहस कर रहे हैं। यह स्थिति सामान्य नहीं है। इसके पीछे सक्रिय आपराधिक नेटवर्क, राजनीतिक संरक्षण और विभागीय मिलीभगत जैसी संभावनाओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
यह भी जांचना होगा कि अवैध शराब का कारोबार किनकी सरपरस्ती में फल-फूल रहा था और परिवहन से लेकर गंतव्य तक इस नेटवर्क को किसका संरक्षण हासिल था। यदि पुलिस या आबकारी विभाग के कुछ अधिकारी-कर्मचारी इस कारोबार से जुड़े हैं तो उनके खिलाफ भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
दिलीप पुरी की मौत पर शोक जताना पर्याप्त नहीं है। असली श्रद्धांजलि तभी होगी, जब शराब माफिया की कमर तोड़ी जाए और खाकी के भीतर छिपे भ्रष्ट तंत्र को भी बेनकाब किया जाए। सरकार को तय करना होगा कि प्रदेश में कानून का राज चलेगा या माफिया का।


