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    ऐसे अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं होती?

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    इंदौर में महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक लक्ष्मी नारायण कंडवाल के यहां लोकायुक्त की कार्रवाई ने एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है, जिससे देश का आम नागरिक भली-भांति परिचित है। एक सरकारी अधिकारी, जिसकी पूरी सेवा अवधि की वैध आय ढाई करोड़ रुपए के आसपास आंकी जा रही है, उसके पास करीब 10 करोड़ रुपए की संपत्ति मिलने की बात सामने आती है। बैंक लॉकरों में सोना, शहर में व्यवसायिक भवन, प्लॉट और कृषि भूमि-यह सब केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसमें भ्रष्टाचार अक्सर जोखिम नहीं, बल्कि लाभ का सौदा बन जाता है। सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि इतनी संपत्ति कैसे जुटाई गई। असली सवाल यह है कि ऐसे मामलों में कठोर और त्वरित कार्रवाई आखिर क्यों नहीं होती? देश में हर साल आय से अधिक संपत्ति के अनेक मामले सामने आते हैं, लोकायुक्त और जांच एजेंसियां छापे मारती हैं, करोड़ों की बेनामी और संदिग्ध संपत्तियां उजागर होती हैं, लेकिन अंतिम सजा तक पहुंचने वाले मामलों की संख्या बेहद कम रहती है।
    कारण साफ है-लंबी कानूनी प्रक्रिया, राजनीतिक संरक्षण, विभागीय ढिलाई और जांच के बाद कार्रवाई की सुस्त रफ्तार। निलंबन होता है, जांच चलती है, अदालतों में फाइलें घूमती रहती हैं और कई बार आरोपी अधिकारी सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त भी हो जाते हैं। जनता के टैक्स से अर्जित वेतन पाने वाले अधिकारी यदि पद का दुरुपयोग कर अकूत संपत्ति खड़ी करते हैं, तो उनके खिलाफ केवल छापे और जांच पर्याप्त नहीं हैं।
    जरूरत इस बात की है कि आय से अधिक संपत्ति के मामलों के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाई जाएं, दोष सिद्ध होने पर संपत्ति तत्काल जब्त हो, पेंशन और सेवा लाभ रोके जाएं तथा जिम्मेदार अधिकारियों को उदाहरणात्मक सजा मिले। जब तक भ्रष्टाचार की कीमत लाभ से अधिक नहीं होगी, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे। लोकायुक्त के छापे सुर्खियां जरूर बनाते हैं, लेकिन जनता अब केवल खुलासे नहीं, परिणाम देखना चाहती है। भ्रष्टाचार पर सबसे बड़ा प्रहार तब होगा, जब करोड़ों की अवैध संपत्ति के साथ पकड़ा गया अधिकारी वर्षों तक मुकदमे नहीं, बल्कि शीघ्र और कठोर दंड का सामना करेगा। यही सुशासन की असली कसौटी भी है।

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