Social Media Regulation: सोशल मीडिया आज अभिव्यक्ति का सबसे सुलभ माध्यम बन चुका है, लेकिन इसी आजादी ने एक गंभीर संकट भी खड़ा कर दिया है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर कोई भी व्यक्ति कुछ भी लिख सकता है, दिखा सकता है और प्रसारित कर सकता है। झूठ, अफवाह, चरित्र हनन, अश्लीलता और नफरत फैलाने वाली सामग्री मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। विडंबना यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में जवाबदेही का सवाल अक्सर पीछे छूट जाता है।
केंद्र सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा यानी ‘सेफ हार्बर’ के प्रावधानों में बदलाव पर विचार कर रही है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत फिलहाल प्लेटफॉर्म को यूजर्स की पोस्ट के लिए सामान्यतः सीधे जिम्मेदार नहीं माना जाता, बशर्ते वे निर्धारित कानूनी शर्तों का पालन करें। अब सवाल उठ रहा है कि जब ये कंपनियां अपने एल्गोरिदम के जरिए तय करती हैं कि कौन-सी सामग्री किसे दिखाई जाएगी, किस पोस्ट की पहुंच बढ़ेगी और किसे हटाया जाएगा, तो फिर उनकी जवाबदेही क्यों नहीं होनी चाहिए?
सोशल मीडिया कंपनियां केवल तकनीकी माध्यम नहीं रह गई हैं। वे जनमत बनाने, सामाजिक धारणाएं प्रभावित करने और राजनीतिक विमर्श की दिशा तय करने की क्षमता रखती हैं। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी केवल विज्ञापन से कमाई करने और कम्युनिटी गाइडलाइन जारी करने तक सीमित नहीं रह सकती।
यह भी समझना होगा कि सोशल मीडिया की बेलगाम सामग्री का सबसे बड़ा नुकसान बच्चों, युवाओं और उन लोगों को उठाना पड़ता है, जो हर सूचना को सच मान लेते हैं। किसी की प्रतिष्ठा नष्ट करना, फर्जी खबर से सामाजिक तनाव पैदा करना या आपत्तिजनक सामग्री को वायरल करना अब कुछ लोगों के लिए सामान्य गतिविधि बनती जा रही है।
लेकिन समाधान केवल कड़े कानून बनाने में नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का मूल अधिकार है। इसलिए कानून ऐसा हो जो आलोचना और असहमति को सुरक्षित रखे, लेकिन जानबूझकर फैलाए गए झूठ, धमकी, अश्लीलता और आपराधिक सामग्री पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करे। प्लेटफॉर्म को शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई, पारदर्शिता और एल्गोरिदम की जवाबदेही के दायरे में लाना होगा। वहीं, जानबूझकर गैरकानूनी सामग्री पोस्ट करने वाले यूजर्स पर भी कानून का शिकंजा कसना चाहिए।
डिजिटल आजादी का अर्थ अराजकता नहीं हो सकता। जिस तरह वास्तविक जीवन में हर नागरिक अपने शब्दों और कर्मों के लिए जवाबदेह है, उसी तरह आभासी दुनिया में भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। सवाल सिर्फ इतना है कि सोशल मीडिया को समाज का आईना बनाना है या उसे अफवाह, अपमान और अराजकता का अखाड़ा बनने देना है?


