लेखक : महेश दीक्षित
मध्य प्रदेश की राजनीति में पिछले चौबीस घंटे कई मायनों में महत्वपूर्ण रहे। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक तरफ समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर बड़ा राजनीतिक संकेत दिया, तो दूसरी ओर भूमि, राजस्व और प्रशासनिक सुधारों के जरिए ग्रामीण और मध्यम वर्ग को साधने की कोशिश भी दिखाई दी। इसके साथ ही भाजपा के भीतर गुटबाज़ी और “कूटी-कौड़ी की राजनीति” को लेकर मुख्यमंत्री की टिप्पणी ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है।
मोहन यादव का यह बयान केवल संगठनात्मक अनुशासन का संदेश नहीं माना जा रहा, बल्कि सत्ता के भीतर चल रहे अंदरूनी समीकरणों पर भी संकेत माना जा रहा है। शिवराज सिंह चौहान के लंबे कार्यकाल के बाद भाजपा अब नए नेतृत्व को मजबूत करने की प्रक्रिया में है। ऐसे में मुख्यमंत्री का यह संदेश स्पष्ट है कि सरकार व्यक्तिगत शक्ति केंद्रों के बजाय केंद्रीकृत नेतृत्व की ओर बढ़ना चाहती है।
राजनीतिक दृष्टि से सबसे अधिक चर्चा UCC को लेकर रही। भाजपा लंबे समय से इसे अपने वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बताती रही है। मध्य प्रदेश में इसकी सक्रियता को 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी से भी जोड़कर देखा जा रहा है। भाजपा इसे “एक देश, एक कानून” का कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे ध्रुवीकरण की राजनीति कह सकता है।
सरकार की दूसरी बड़ी कोशिश भूमि और राजस्व व्यवस्था को सरल बनाने की है। करीब 48 लाख संपत्तियों के रिकॉर्ड और नामांतरण प्रक्रिया को आसान बनाने के संकेत दिए गए हैं। यदि सरकार पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था लागू कर पाती है, तो इसका सीधा लाभ ग्रामीण क्षेत्रों में मिल सकता है, जहां सबसे अधिक विवाद जमीन और सीमांकन को लेकर होते हैं।
हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सिंगरौली में मुख्यमंत्री के काफिले के दौरान ट्रैफिक रोकने पर जनता का विरोध यह दिखाता है कि आम लोग अब वीआईपी संस्कृति को लेकर पहले से अधिक संवेदनशील हैं। वहीं कर्मचारी वर्ग महंगाई, वेतन विसंगति और प्रशासनिक दबावों से परेशान है।
मोहन यादव सरकार धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को भी अपनी राजनीति का बड़ा आधार बना रही है। उज्जैन, महाकाल और धार्मिक पर्यटन को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। भाजपा का प्रयास विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को साथ जोड़ने का दिखाई देता है।
कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश सरकार अब केवल प्रशासनिक फैसले नहीं ले रही, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक कथा गढ़ने की कोशिश कर रही है। लेकिन असली परीक्षा घोषणाओं की नहीं, बल्कि उनके जमीन पर दिखने वाले परिणामों की होगी।


