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    फिर शुरू होगा जनता के बीच पहुंचने का सरकारी कर्मकांड

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    महेश दीक्षित

    मध्य प्रदेश में 7 अगस्त से मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान शुरू होने जा रहा है। सरकारी दावों के मुताबिक अधिकारी गांव-गांव जाएंगे, लोगों की समस्याएं सुनेंगे, लंबित प्रकरणों का निराकरण करेंगे और योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाएंगे। सुनने में यह सब अच्छा लगता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में प्रशासनिक सुधार का प्रयास है या फिर एक और सरकारी कर्मकांड?

    यह पहला मौका नहीं है, जब जनता के बीच पहुंचने का अभियान शुरू हो रहा है। इससे पहले भी अलग-अलग नामों से ऐसी कई पहलें हो चुकी हैं। कभी समाधान शिविर लगे, कभी जनसुनवाई अभियान चले, कभी प्रशासन गांवों की ओर निकला, तो कभी अधिकारियों को चौपाल लगाने के निर्देश दिए गए। हर बार दावा किया गया कि अब जनता को दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ फिर पुराने ढर्रे पर लौट आया। आम आदमी आज भी राजस्व, पंचायत, बिजली, पानी, आवास, पेंशन और लोक सेवा गारंटी से जुड़े मामलों में महीनों तक भटकता दिखाई देता है।

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    दरअसल, किसी भी व्यवस्था की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि उसने कितने शिविर लगाए, बल्कि इससे होती है कि लोगों को शिविर लगाने की जरूरत ही क्यों पड़ी। यदि तहसील, जनपद, नगर निगम, पंचायत और जिला कार्यालय नियमित रूप से संवेदनशील और जवाबदेह हों, तो विशेष अभियान चलाने की आवश्यकता ही नहीं होगी। अभियान यह भी स्वीकार करता है कि रोजमर्रा की प्रशासनिक व्यवस्था कहीं न कहीं अपेक्षित परिणाम देने में विफल रही है।

    चिंता इस बात की भी है कि ऐसे अभियानों में अक्सर अधिकारियों का पूरा ध्यान वास्तविक समाधान से अधिक लक्ष्य पूरा करने और आंकड़े सुधारने पर केंद्रित हो जाता है। पोर्टल पर लंबित प्रकरण कम दिखने लगते हैं, रिपोर्टों में उपलब्धियां दर्ज हो जाती हैं और तस्वीरों में अधिकारी जनता के बीच दिखाई देते हैं, लेकिन अभियान समाप्त होते ही शिकायतों का वही सिलसिला फिर शुरू हो जाता है।

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    बेशक, यदि अधिकारी ईमानदारी से गांवों में जाएं, लोगों की समस्याएं मौके पर सुनें और समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करें, तो इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन इसकी सफलता का पैमाना उद्घाटन समारोह, समीक्षा बैठकें या प्रेस विज्ञप्तियां नहीं होंगी। असली कसौटी यह होगी कि क्या छह महीने बाद भी नागरिक को अपने छोटे-से काम के लिए किसी बिचौलिए या सिफारिश की जरूरत नहीं पड़ेगी।

    सरकार को यह समझना होगा कि जनता अब केवल घोषणाओं से प्रभावित नहीं होती। उसे परिणाम चाहिए। विश्वास किसी अभियान से नहीं, बल्कि व्यवस्था के रोजमर्रा के व्यवहार से पैदा होता है। यदि हर शिकायत के समाधान के लिए अलग अभियान चलाना पड़े, तो इसका अर्थ है कि व्यवस्था अभी भी आत्मनिर्भर नहीं बन पाई है।

    मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान निश्चित रूप से एक अवसर है, लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या यह प्रशासन की कार्यशैली बदल पाएगा या फिर यह भी उन अभियानों की लंबी सूची में शामिल हो जाएगा, जिनकी शुरुआत पूरे उत्साह से हुई और समापन के बाद उन्हें कोई याद नहीं रख पाया। जनता अब शिविरों से ज्यादा ऐसी व्यवस्था चाहती है, जहां उसे अपने अधिकार के लिए अभियान नहीं, केवल आवेदन देना पड़े।

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