अयोध्या। अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े विवाद के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के स्तर पर डैमेज कंट्रोल की कवायद तेज होने की चर्चाएं हैं। हालांक न ही संघ, ट्रस्ट या संबंधित पक्षों की ओर से आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि की गई है।
सूत्रों के अनुसार, संघ नेतृत्व ट्रस्ट से जुड़े विवाद के राजनीतिक और संगठनात्मक प्रभावों का आकलन कर रहा है। चर्चा है कि ट्रस्ट के वरिष्ठ सदस्य रहे चंपत राय की भूमिका सीमित करने पर विचार किया जा सकता है, जबकि ट्रस्ट से जुड़े अनिल मिश्रा के संबंध में कानूनी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा या एफआईआर सार्वजनिक नहीं हुई है।
सूत्रों का दावा है कि संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल पूरे घटनाक्रम की निगरानी कर रहे हैं। कर्नाटक के हुबली में शुरू हो रही प्रांत प्रचारकों की बैठक में राम मंदिर ट्रस्ट की साख, पारदर्शिता और संगठनात्मक विश्वास बहाली को प्रमुख विषयों में शामिल किए जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले बढ़ी रणनीतिक चिंता
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगले वर्ष प्रस्तावित उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा और संघ इस पूरे प्रकरण को गंभीरता से ले रहे हैं। संगठन के भीतर यह चिंता बताई जा रही है कि यदि कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष बना रहा तो इसका असर चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है।
सूत्रों के मुताबिक, 22 जुलाई को प्रस्तावित ट्रस्ट की बैठक से पहले संगठनात्मक स्तर पर एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की जा सकती है, जिसका उद्देश्य विवाद पर नियंत्रण के साथ-साथ ट्रस्ट के प्रति जनता का विश्वास बनाए रखना होगा।
राम मंदिर ट्रस्ट की साख बनाए रखना बड़ी चुनौती
राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में ट्रस्ट से जुड़े किसी भी विवाद का असर केवल संस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन जाता है। इसी कारण संघ और भाजपा के लिए यह मुद्दा संवेदनशील माना जा रहा है।
सूत्रों का यह भी दावा है कि संगठन कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास बनाए रखने के लिए सक्रिय रणनीति पर काम कर रहा है, ताकि आगामी चुनावों से पहले किसी प्रकार की नकारात्मक धारणा को कम किया जा सके।


