जबलपुर। मध्य प्रदेश की राजनीति से जुड़े चर्चित निर्मला सप्रे दल-बदल मामले में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया है। याचिका में बीना से विधायक निर्मला सप्रे के खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई करने और उनका निर्वाचन शून्य घोषित करने की मांग की गई थी।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने सुनवाई के बाद कहा कि विधानसभा अध्यक्ष पहले से ही मामले की जांच कर रहे हैं और कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित पक्षों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। ऐसे में न्यायालय को हस्तक्षेप करने या कोई अतिरिक्त आदेश जारी करने की आवश्यकता नहीं है।
दरअसल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि बीना विधायक निर्मला सप्रे ने कांग्रेस विरोधी गतिविधियों में हिस्सा लिया और लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यक्रम में मंच साझा किया था। याचिका में दावा किया गया था कि वह भाजपा के साथ सक्रिय रूप से जुड़ चुकी हैं, लेकिन विधायक पद से इस्तीफा नहीं दिया है, जो दल-बदल कानून की भावना के विपरीत है।
याचिका में यह भी कहा गया था कि 30 जून 2024 को विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई थी, लेकिन लंबे समय तक निर्णय नहीं लिया गया। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का हवाला दिया था, जिसमें दल-बदल से जुड़े मामलों का समयबद्ध निपटारा करने की बात कही गई है।
वहीं विधायक निर्मला सप्रे की ओर से अदालत में दायर जवाब में कहा गया कि उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफा दिया है, लेकिन भाजपा की सदस्यता ग्रहण नहीं की है। उनके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार और राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष मामला विचाराधीन है, इसलिए न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि विधानसभा अध्यक्ष ने संबंधित पक्षों के बयान दर्ज कर लिए हैं और मामले की प्रक्रिया जारी है। विधानसभा का कार्यकाल अभी दो वर्ष से अधिक शेष है, इसलिए किसी प्रकार की असाधारण परिस्थिति नहीं है, जिसमें न्यायालय को तत्काल हस्तक्षेप करना पड़े।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने 18 जून को फैसला सुरक्षित रख लिया था। गुरुवार को सुनाए गए निर्णय में अदालत ने याचिका को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि विधानसभा अध्यक्ष को कानूनी प्रक्रिया पूरी करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
इस फैसले को कांग्रेस के लिए राजनीतिक झटका माना जा रहा है, जबकि निर्मला सप्रे के लिए यह बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है। अब सभी की निगाहें विधानसभा अध्यक्ष के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं, जो इस पूरे मामले की दिशा तय करेगा।


