वाशिंगटन। गंभीर या दुर्लभ बीमारी से जूझने वाले ज्यादातर लोग बेहतर इलाज की तलाश में डॉक्टरों का रुख करते हैं, लेकिन कुछ मरीजों ने अपने दर्द और बीमारी के अनुभव को वैज्ञानिक शोध की दिशा बना लिया। वर्षों तक गलत निदान, असहनीय दर्द और बीमारी के खतरे का सामना करने के बाद इन मरीजों ने विज्ञान को अपना करियर बनाया। अब वे ऐसी बीमारियों के इलाज की खोज में जुटे हैं, जिनके उपचार के विकल्प अभी बेहद सीमित हैं।
EPP से जूझीं फ्रांसेस्का ग्रानाटा
इटली की आणविक जीवविज्ञानी फ्रांसेस्का ग्रानाटा बचपन से ही त्वचा में तेज दर्द झेलती थीं। स्थिति इतनी गंभीर थी कि मां का गले लगाना भी मुश्किल हो जाता था। वर्ष 2008 में जांच के बाद उन्हें एरिथ्रोपोएटिक प्रोटोपोरफीरिया (EPP) नामक आनुवंशिक बीमारी का पता चला। इस बीमारी में लाल रक्त कोशिकाओं में प्रोटोपोरफीरिन जमा हो जाता है, जिससे रोशनी के संपर्क में आने पर त्वचा में तेज जलन और दर्द हो सकता है। गंभीर मामलों में इसका असर लिवर पर भी पड़ सकता है।
मां की बीमारी ने सोनिया वल्लभ की राह बदली
अमेरिकी वैज्ञानिक सोनिया वल्लभ की मां की वर्ष 2010 में तेजी से बढ़ती स्मृतिभ्रंश की बीमारी से मौत हो गई। जांच में आनुवंशिक प्रायन बीमारी की पुष्टि हुई। बाद में वल्लभ ने खुद की जांच कराई तो उनमें भी बीमारी से जुड़ा जीन परिवर्तन मिला। उस समय वह कानून के क्षेत्र में काम कर रही थीं, लेकिन मां की मौत और खुद में बीमारी का खतरा सामने आने के बाद उन्होंने करियर बदलकर विज्ञान की पढ़ाई शुरू की। अब वह अपने पति और संगणकीय जीवविज्ञानी एरिक मिनिकल के साथ प्रायन बीमारी के उपचार पर शोध कर रही हैं।
अपनी बीमारी से खोजा इलाज का नया रास्ता
कैसलमैन बीमारी से पीड़ित चिकित्सक-शोधकर्ता डेविड फाजेनबॉम ने अपनी बीमारी के इलाज के लिए पहले से उपलब्ध दवा के नए इस्तेमाल की संभावना तलाश की। बीमारी के दौरान कई बार उनकी हालत गंभीर हुई। अपने रक्त परीक्षण और वैज्ञानिक आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद उन्होंने ऐसी दवा की पहचान की, जो प्रतिरक्षा तंत्र की अत्यधिक सक्रियता को नियंत्रित कर सकती थी।
दवा के इस्तेमाल के बाद वह एक दशक से अधिक समय से बीमारी के दोबारा उभरने से बचे हुए हैं। अब उनका संगठन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से मौजूदा दवाओं में दुर्लभ बीमारियों के संभावित उपचार तलाश रहा है।
MS का पता चला तो उसी पर शुरू किया शोध
स्टेम-सेल वैज्ञानिक वैलेंटिना फोसाती को 30 वर्ष की उम्र में मल्टीपल स्क्लेरोसिस (MS) का पता चला। बीमारी का सामना करने के बाद उन्होंने इसी क्षेत्र में वैज्ञानिक शोध शुरू किया। उनका शोध स्टेम कोशिकाओं से मस्तिष्क की अलग-अलग कोशिकाएं विकसित करने और यह समझने पर केंद्रित है कि MS में तंत्रिका तंतुओं को ढकने वाली मायलिन परत क्यों नष्ट होती है और इसे कैसे रोका जा सकता है।
मरीज-शोधकर्ताओं का अनुभव बन रहा ताकत
खुद बीमारी झेल चुके वैज्ञानिक मरीजों की वास्तविक परेशानियों को बेहतर ढंग से समझते हैं। उपचार के दौरान दवाओं के दुष्प्रभाव, इंजेक्शन का डर या एमआरआई जैसी प्रक्रियाओं में होने वाली असुविधाओं को ध्यान में रखकर क्लिनिकल ट्रायल को अधिक मरीज-केंद्रित बनाया जा सकता है।
इन वैज्ञानिकों की कहानियां बताती हैं कि व्यक्तिगत पीड़ा कभी-कभी वैज्ञानिक खोज की बड़ी प्रेरणा बन सकती है। अपने अनुभव को शोध में बदलकर ये मरीज-शोधकर्ता न केवल अपने लिए, बल्कि दुनिया भर के हजारों मरीजों के लिए बेहतर और प्रभावी उपचार की उम्मीद तलाश रहे हैं।


