पति-पत्नी के बीच किसी बात को लेकर तकरार हो गई। गुस्से में पत्नी ने तय कर लिया कि अब वह इस घर में नहीं रहेगी। पति और बच्चे खाना खाकर सो चुके थे। रात के सन्नाटे में वह घर से निकल पड़ी।
वह बिना किसी मंजिल के मोहल्ले की गलियों में भटक रही थी। मन में शिकायतें थीं, आंखों में आंसू और दिल में अपनों से दूर जाने का दर्द।
चलते-चलते एक छोटे से घर के बाहर कदम रुक गए। भीतर से एक मां की सिसकियों भरी आवाज आ रही थी-
“हे प्रभु! आज मेरे बच्चे को एक वक्त की रोटी मिल जाए, बस इतनी कृपा कर देना।”
यह सुनकर उसके कदम ठिठक गए।
कुछ दूर आगे बढ़ी तो दूसरे घर से आवाज आई-
“हे भगवान! मेरे बेटे को हर संकट से बचाए रखना। उसके सिर पर हमेशा अपना हाथ बनाए रखना।”
वह चुपचाप आगे बढ़ती रही।
अगले घर में एक पति अपनी पत्नी से कह रहा था-
“कल मकान मालिक आए तो उससे हाथ जोड़कर दो-चार दिन की मोहलत मांग लेना। अभी किराया देने की स्थिति नहीं है।”
थोड़ी दूर पर एक बुजुर्ग दादी अपने पोते से बोलीं-
“बेटा, कई दिनों से दवा खत्म हो गई है। कब लाएगा?”
पोते की भर्राई हुई आवाज आई-
“दादी, मेडिकल वाला अब उधार दवा नहीं देता… और मेरे पास पैसे भी नहीं हैं।”
उस स्त्री की आंखें नम होने लगीं।
आगे बढ़ी तो एक और झोपड़ी से मां की ममता भरी आवाज सुनाई दी-
“बेटा, सो जाओ। तुम्हारे बाबा मजदूरी से लौटेंगे तो कुछ खाने को जरूर लाएंगे। तब मैं तुम्हें जगा दूंगी।”
यह सुनते ही उसके भीतर कुछ बदलने लगा।
अब उसे अपना घर याद आने लगा… अपना परिवार… अपने पति का स्नेह… अपने बच्चों की मुस्कान।
उसे एहसास हुआ कि जिस बात को वह अपने जीवन का सबसे बड़ा दुख समझ रही थी, वह तो जीवन का एक छोटा-सा मतभेद था।
वह तुरंत घर लौट आई।
घर पहुंचकर उसने सोते हुए पति और बच्चों को देखा। उसकी आंखों से आंसू बह निकले। उसने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया-
“प्रभु! आपने मुझे सिर पर छत दी, परिवार दिया, बच्चे दिए और ऐसा जीवनसाथी दिया जो हर परिस्थिति में मेरा साथ निभाता है। छोटी-छोटी बातों में मैं आपकी कृपा को भूल गई थी।”
उस रात उसने समझ लिया कि जीवन की सबसे बड़ी दौलत धन नहीं, बल्कि अपना परिवार, संतोष और कृतज्ञता है।
शास्त्रों की सीख
श्रीमद्भगवद्गीता (2.14) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
“मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः…”
अर्थात् जीवन में सुख और दुख दोनों आते-जाते रहते हैं। बुद्धिमान वही है जो दोनों परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखे।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं-
“परहित सरिस धरम नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई।”
अर्थात् दूसरों के दुख को समझना और उनके प्रति संवेदनशील होना सबसे बड़ा धर्म है।
संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा भी यही संदेश देता है-
“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए।।”
अर्थात् ईश्वर उतना ही दें, जिससे परिवार का सम्मानपूर्वक पालन हो जाए और जरूरतमंद की सहायता भी की जा सके।
कहानी की सीख
जीवन में हर व्यक्ति किसी न किसी संघर्ष से गुजर रहा है। जो लोग बाहर से मुस्कुराते दिखाई देते हैं, उनके भीतर भी दर्द, जिम्मेदारियां और अधूरे सपने छिपे हो सकते हैं।
दूसरों की खुशियों से अपनी जिंदगी की तुलना करने के बजाय, ईश्वर ने जो दिया है उसके प्रति आभार व्यक्त करना ही सच्चा सुख है। कृतज्ञता मन को शांति देती है, संतोष रिश्तों को मजबूत बनाता है और परिवार जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।
याद रखिए-
“जिस दिन शिकायत की जगह धन्यवाद आ जाता है, उसी दिन से जीवन में सुख और शांति का वास्तविक आरंभ हो जाता है।”


