सनातन धर्म में कार्तिक मास को अत्यंत पुण्यदायी और पवित्र माना गया है। इस महीने में स्नान, दान, पूजा-पाठ और भगवान विष्णु तथा शिव की आराधना का विशेष महत्व बताया गया है। कार्तिक मास से जुड़ी अनेक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें आस्था, भक्ति और ईश्वर की कृपा का संदेश मिलता है।
ऐसी ही एक प्रसिद्ध लोककथा है ब्राह्मण, ब्राह्मणी और सात कमरों की कथा, जिसमें कार्तिक देवता की कृपा से एक निःसंतान दंपत्ति को बहू और फिर पुत्र प्राप्त होता है। यह कथा विश्वास, सेवा, धैर्य और भक्ति के महत्व को दर्शाती है।
एक नगर में एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी ब्राह्मणी रहते थे। दोनों प्रतिदिन सात कोस दूर गंगा स्नान करने जाते थे। लंबी दूरी तय करने के कारण ब्राह्मणी अक्सर थक जाती थी।
एक दिन उसने दुखी होकर कहा, “काश! हमारा भी एक बेटा होता। उसकी बहू घर संभालती, हमारे लौटने पर भोजन तैयार मिलता और हमें आराम भी मिल जाता।”
ब्राह्मण ने मुस्कुराते हुए कहा, “यदि तुम्हारी यही इच्छा है, तो मैं आज ही तुम्हारे लिए बहू लेकर आता हूं।”
ब्राह्मणी आश्चर्यचकित रह गई, लेकिन उसने पति के कहने पर आटे की एक पोटली तैयार कर दी, जिसमें कुछ सोने की मोहरें भी रख दी गईं।
पोटली लेकर निकले ब्राह्मण की नजर नदी किनारे खेल रही कुछ कन्याओं पर पड़ी। वे रेत के घर बना रही थीं। तभी एक लड़की बोली, “मैं अपना घर नहीं तोड़ूंगी, क्योंकि मुझे रहने के लिए घर चाहिए।”
उसकी समझदारी और सरलता देखकर ब्राह्मण ने मन ही मन उसे अपनी बहू बनाने का निश्चय कर लिया।
वह लड़की के घर पहुंचा और उसकी मां से आटा छानकर रोटी बनाने का आग्रह किया। जब लड़की की मां ने आटा छाना, तो उसमें से सोने की मोहरें निकलीं। वह समझ गई कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है।
बातों-बातों में विवाह की चर्चा हुई और अंततः लड़की की शादी प्रतीकात्मक रूप से खांड कटोरे से कर दी गई। इसके बाद ब्राह्मण उसे अपने घर बहू बनाकर ले आया।
नई बहू घर आई तो उसने पूरे मन से सास-ससुर की सेवा शुरू कर दी। वह उनके लिए भोजन बनाती, घर का काम संभालती, कपड़े धोती और रात को उनके पैर भी दबाती थी।
ब्राह्मण और ब्राह्मणी उसकी सेवा से अत्यंत प्रसन्न थे। समय खुशी-खुशी बीतने लगा।
एक दिन सास ने बहू से कहा, “चूल्हे की आग कभी बुझने मत देना और मटके का पानी कभी खाली मत होने देना।”
एक दिन अचानक चूल्हे की आग बुझ गई। बहू आग लेने पड़ोस में गई। वहां पड़ोसन ने उसे भड़काते हुए कहा कि उसके सास-ससुर ने उसे धोखे से बहू बनाया है, क्योंकि उनका कोई बेटा ही नहीं है।
पहले तो बहू ने विश्वास नहीं किया, लेकिन धीरे-धीरे वह पड़ोसन की बातों में आ गई।
पड़ोसन की सलाह पर उसने सास-ससुर को जली हुई रोटियां और बेस्वाद दाल परोस दी। इतना ही नहीं, उसने उनका अपमान भी किया।
पड़ोसन के कहने पर बहू ने सातों कमरों की चाबी मांग ली। अगले दिन जब ब्राह्मण और ब्राह्मणी गंगा स्नान के लिए निकले, तो बहू ने जिद कर चाबियां ले लीं।
सास-ससुर के जाने के बाद उसने एक-एक करके सभी कमरे खोले। किसी कमरे में अन्न भरा था। किसी में धन-संपत्ति रखी थी। कहीं कीमती बर्तन और सामग्री थी। लेकिन जब उसने सातवां कमरा खोला, तो उसकी आंखें आश्चर्य से फैल गईं। सातवें कमरे में भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश, माता लक्ष्मी, तुलसी माता, गंगा-यमुना और 33 करोड़ देवी-देवता विराजमान थे।
वहीं चंदन की चौकी पर एक तेजस्वी युवक बैठा माला जप रहा था।
बहू ने उससे पूछा, “तुम कौन हो?”
युवक ने उत्तर दिया, “मैं तुम्हारा पति हूं। अभी यह कमरा बंद कर दो। जब माता-पिता आएं, तब इसे खोलना।”
कार्तिक देवता की कृपा से मिला पुत्र
बहू ने सोलह श्रृंगार किया, स्वादिष्ट भोजन बनाया और सास-ससुर की सेवा की।
जब ब्राह्मण और ब्राह्मणी लौटे, तो उसने सातवां कमरा खोलकर उन्हें सब कुछ दिखाया।
वहां देवताओं के बीच बैठे युवक ने कहा, “मां, मैं आपका बेटा हूं। मुझे कार्तिक देवता ने आपकी भक्ति और सेवा से प्रसन्न होकर भेजा है।”
यह सुनकर ब्राह्मण और ब्राह्मणी भावुक हो उठे।
जब लोगों ने इस बात पर संदेह किया, तो विद्वान पंडितों को बुलाया गया।
पंडितों ने परीक्षा ली और ईश्वर की कृपा से ऐसा चमत्कार हुआ कि ब्राह्मणी के मातृत्व का प्रमाण स्वयं प्रकृति ने दे दिया।
तब सभी ने स्वीकार किया कि यह युवक वास्तव में उसी वृद्ध दंपत्ति का पुत्र है, जिसे कार्तिक देवता ने उनकी श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर प्रदान किया था।
कथा का संदेश
यह कथा हमें सिखाती है कि-
सच्ची श्रद्धा और भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। सेवा और समर्पण का फल अवश्य मिलता है। दूसरों की बातों में आकर अपने प्रियजनों पर संदेह नहीं करना चाहिए। कार्तिक मास में स्नान, पूजा और धर्म-कर्म करने वालों पर भगवान विशेष कृपा करते हैं।


