सनातन धर्म में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या भगवान की प्राप्ति केवल संन्यास लेकर ही संभव है? क्या परिवार, नौकरी और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच रहकर भी भक्ति की जा सकती है? श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत महापुराण का स्पष्ट उत्तर है- हाँ, गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी ईश्वर की प्राप्ति संभव है।
भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन को संन्यास लेने के लिए नहीं कहा, बल्कि अपने कर्तव्य का पालन करते हुए ईश्वर में मन लगाने का संदेश दिया। गीता का प्रसिद्ध श्लोक है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(श्रीमद्भगवद्गीता 2.47)
अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं। इसलिए अपने कर्तव्य को ईश्वर को समर्पित भाव से करना ही सच्चा कर्मयोग है।
इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण गीता (9.27) में कहते हैं-
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
अर्थात जो भी कर्म करो, जो भोजन करो, जो दान दो या तप करो, वह सब मुझे अर्पित करो। यही गृहस्थ जीवन में भक्ति का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग है।
गृहस्थ के लिए भक्ति का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए भगवान को जीवन का केंद्र बनाना है। माता-पिता की सेवा, पति-पत्नी के प्रति निष्ठा, बच्चों का उत्तम संस्कार, ईमानदारी से आजीविका कमाना और जरूरतमंदों की सहायता करना भी भगवान की सेवा का ही रूप है।
यदि प्रतिदिन कुछ समय भगवान के नाम का जप, गीता का अध्ययन, भगवत कथा का श्रवण और सत्संग के लिए निकाला जाए, तो धीरे-धीरे मन में वैराग्य और शांति का उदय होता है। भक्ति केवल मंदिर में दीप जलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि हर कर्म में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करना ही वास्तविक साधना है।
भगवान श्रीकृष्ण गीता (18.66) में अंतिम संदेश देते हैं-
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थात सभी प्रकार के अहंकार और आसक्ति को छोड़कर मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सभी बंधनों से मुक्त कर दूँगा।
इसलिए यह समझना आवश्यक है कि गृहस्थाश्रम बंधन नहीं है, बल्कि ईश्वर की ओर बढ़ने का एक श्रेष्ठ साधन है। जब मनुष्य अपने प्रत्येक कर्म को भगवान को समर्पित कर देता है, तब उसका घर ही मंदिर बन जाता है और उसका जीवन भक्ति का मार्ग। भगवान संसार छोड़ने से नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए उन्हें अपना सर्वस्व मानने से प्रसन्न होते हैं। यही श्रीमद्भगवद्गीता का शाश्वत संदेश है।


