सनातन परंपरा में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता माना गया है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन और अटूट विश्वास से उनका स्मरण करता है, भगवान उसकी रक्षा के लिए किसी न किसी रूप में अवश्य सहायता करते हैं। यह लोककथा भी इसी अटूट श्रद्धा और भगवान विष्णु की कृपा का सुंदर संदेश देती है।
एक घने जंगल में एक नन्ही चिड़िया अपने दो छोटे बच्चों के साथ घोंसले में रहती थी। एक दिन वह अपने बच्चों के लिए दाना लेकर लौटी। दोनों बच्चे बहुत भूखे थे। चुन्नू बोला, “मां, पहले मुझे दाना खिलाओ।” तभी मुन्नू भी कहने लगा, “नहीं मां, पहले मुझे खिलाओ।”
चिड़िया मुस्कुराई और दोनों को बराबर-बराबर दाना खिलाया। फिर उसने प्यार से कहा, “बेटा, यहां की फसल कट चुकी है। अब मुझे दाना लेने दूसरे गांव जाना पड़ेगा। मैं घोंसले में कुछ दाने रख जाती हूं। तुम उन्हें थोड़ा-थोड़ा खा लेना। मुझे लौटने में एक दिन लग सकता है।”
यह सुनकर दोनों बच्चे उदास हो गए, लेकिन मां की बात मान गए।
अगले दिन चिड़िया दूसरे गांव पहुंची। लंबी उड़ान के कारण वह थक गई थी, इसलिए एक पेड़ पर बैठकर विश्राम करने लगी। तभी एक शिकारी ने उसे पकड़ लिया और पिंजरे में बंद करके अपने घर ले आया।
घर पहुंचकर उसने अपनी पत्नी जानकी से कहा, “आज केवल एक चिड़िया हाथ लगी है। इसे संभालकर रखना, कल बाजार में बेच देंगे।”
जानकी का स्वभाव दयालु था। उसे पशु-पक्षियों का शिकार पसंद नहीं था। रात में जब सब सो गए, तब उसने देखा कि पिंजरे में बंद चिड़िया बार-बार “नारायण… नारायण…” का जाप कर रही है।
जानकी ने आश्चर्य से पूछा, “तुम लगातार भगवान विष्णु का नाम क्यों ले रही हो?”
चिड़िया ने नम्रता से उत्तर दिया, “मेरे दो छोटे बच्चे जंगल में अकेले हैं। मैं उनके लिए दाना लेने निकली थी। यदि मैं समय पर नहीं पहुंची तो वे भूख से तड़प जाएंगे। इसलिए मैं भगवान विष्णु से प्रार्थना कर रही हूं कि वे मेरी या मेरे बच्चों की रक्षा करें।”
जानकी ने कहा, “हमने तो कभी भगवान की भक्ति नहीं की। क्या तुम्हें सचमुच विश्वास है कि भगवान तुम्हारी सहायता करेंगे?”
चिड़िया ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा, “भगवान विष्णु समस्त संसार के पालनहार हैं। जो उन पर सच्ची श्रद्धा रखता है, वे उसकी रक्षा अवश्य करते हैं।”
जानकी बोली, “मैं अपने पतिव्रत धर्म के कारण तुम्हें चुपके से मुक्त नहीं कर सकती, लेकिन मैं देखना चाहती हूं कि तुम्हारा विश्वास कैसे सफल होता है। यदि तुम्हारी बात सच निकली तो मैं भी भगवान विष्णु की भक्ति करूंंगी।”
चिड़िया मुस्कुराकर बोली, “मुझे विश्वास है कि यह सब भगवान की ही लीला है। शायद वे तुम्हारे मन में भी भक्ति का दीप जलाना चाहते हैं।”
सुबह जानकी ने सारी बात अपने पति को बताई, लेकिन शिकारी ने इसे अंधविश्वास कहकर टाल दिया और चिड़िया को बेचने बाजार निकल पड़ा। जानकी भी उसके साथ चल दी।
बाजार में शिकारी ने चिड़िया को एक कसाई को बेच दिया। कसाई उसे काटने की तैयारी करने लगा। तभी सभी ने देखा कि चिड़िया भयभीत होने के बजाय प्रसन्न दिखाई दे रही है।
जानकी ने आश्चर्य से पूछा, “तुम्हारी मृत्यु होने वाली है, फिर भी तुम खुश क्यों हो?”
चिड़िया ने शांत स्वर में कहा, “यदि आज मेरा अंत भी हो जाए तो मुझे पूरा विश्वास है कि भगवान विष्णु ने मेरे बच्चों की रक्षा अवश्य कर दी होगी। यही सोचकर मैं प्रसन्न हूं।”
इतने में वहां एक महिला दौड़ती हुई आई और उसने कसाई से कहा, “भैया, यह चिड़िया मुझे दे दीजिए। जितने पैसे चाहिए, मैं दूंगी।”
कसाई ने चिड़िया उसे बेच दी।
जानकी ने उस महिला से पूछा, “तुमने यह चिड़िया क्यों खरीदी?”
महिला ने बताया, “मेरा बेटा जन्म से गूंगा है। एक संत ने मुझे बताया था कि यदि मैं बलि के लिए लाई गई एक चिड़िया को बचाकर उसका झूठा पानी अपने बेटे को पिलाऊं, तो उसकी वाणी लौट आएगी। इसलिए मैं इसे बचाने आई हूं।”
महिला ने चिड़िया को मुक्त कर दिया और अपने बेटे के लिए पानी लेकर चली गई।
चिड़िया उड़ने से पहले जानकी से बोली, “देखा, भगवान विष्णु ने मेरी भी रक्षा की और मेरे बच्चों की भी।”
यह दृश्य देखकर जानकी, शिकारी और कसाई तीनों की आंखें नम हो गईं। उन्हें भगवान पर सच्ची श्रद्धा का महत्व समझ में आ गया। कहते हैं कि उसी दिन से तीनों ने हिंसा का मार्ग छोड़ दिया और भगवान विष्णु की भक्ति तथा सत्कर्म के मार्ग पर चल पड़े।
कथा का संदेश
यह कथा सिखाती है कि भगवान पर अटूट विश्वास, करुणा और सच्ची भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। जो व्यक्ति निष्कपट भाव से ईश्वर का स्मरण करता है, उसके जीवन में कठिन परिस्थितियों में भी सहायता का मार्ग अवश्य खुलता है। साथ ही यह कहानी जीवों पर दया, अहिंसा और ईश्वर में अटूट आस्था का संदेश भी देती है।


