संसद की कार्यवाही बाधित होने से करोड़ों रुपये के नुकसान का अनुमान
नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के खत्म होने में अब सिर्फ दो दिन बाकी हैं, लेकिन अब तक की कार्यवाही को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। सत्र के 17 दिनों में संसद में 12 नए बिल पेश किए गए। इनमें से 7 बिल लोकसभा और राज्यसभा दोनों से पारित हो चुके हैं। खास बात यह है कि इन 7 बिलों में से केवल 2 पर सदन में चर्चा हुई, जबकि बाकी विधेयक विपक्ष के हंगामे और विरोध के बीच पारित किए गए।
संसद की कार्यवाही भी लगातार बाधित रही। 17 दिनों में लोकसभा महज 16 घंटे 20 मिनट चली, जबकि राज्यसभा में करीब 28 घंटे 50 मिनट काम हुआ। इस तरह दोनों सदनों की कार्यवाही निर्धारित समय की तुलना में काफी कम रही।
36 मिनट में 7 बिल पास
लोकसभा में विधेयकों को पारित करने की रफ्तार भी चर्चा का विषय रही। सिर्फ 36 मिनट में 7 बिल पास कर दिए गए। यानी औसतन एक विधेयक को पारित करने में करीब 5 मिनट का समय लगा।
हालांकि कुछ विधेयकों पर अपेक्षाकृत ज्यादा समय लगा, क्योंकि सांसदों की ओर से संशोधन प्रस्ताव पेश किए गए थे। इसके बावजूद अधिकांश विधेयक विस्तृत चर्चा के बिना ही पारित हो गए।
12 दिन हंगामे में बीते
मानसून सत्र के दौरान विपक्ष के विरोध और हंगामे का असर दोनों सदनों की कार्यवाही पर पड़ा। अब तक 17 बैठकें हो चुकी हैं, जिनमें 12 दिन ऐसे रहे जब हंगामे के कारण दोनों सदनों में कोई खास कामकाज नहीं हो सका।
संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ था। सत्र समाप्त होने में अभी दो दिन बाकी हैं, ऐसे में अंतिम आंकड़ों में बदलाव संभव है।
हर मिनट करीब 2.5 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान
पीठासीन अधिकारी जगदंबिका पाल के मुताबिक संसद की कार्यवाही चलाने पर प्रति मिनट करीब 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं। इसी आधार पर हंगामे के कारण हुए कामकाज के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है।
12 दिन तक दोनों सदनों में कामकाज प्रभावित रहने के आधार पर अब तक करीब 108 करोड़ रुपये के संसदीय समय के नुकसान का अनुमान है। हालांकि यह एक अनुमानित गणना है और वास्तविक वित्तीय नुकसान इससे अलग हो सकता है।
चर्चा बनाम हंगामा बना बड़ा सवाल
मानसून सत्र के आंकड़े संसद में विधायी कामकाज की गुणवत्ता और सदन में होने वाली बहस को लेकर सवाल खड़े करते हैं। एक ओर सरकार लगातार विधेयक पारित कराने पर जोर दे रही है, वहीं विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की मांग करते हुए सदन में विरोध कर रहा है।
सत्र के अंतिम दो दिनों में अब यह देखना अहम होगा कि कितने और विधेयक पेश या पारित होते हैं और सदनों में कितना प्रभावी कामकाज हो पाता है।


