भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के दूसरे दिन राज्य की राजनीति के लिए अहम फैसला सामने आया। सदन ने समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक-2026 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। विधेयक पर चर्चा के दौरान सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बहस, नारेबाजी और हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही दो बार स्थगित करनी पड़ी। कांग्रेस ने विधेयक को प्रवर समिति (सेलेक्ट कमेटी) के पास भेजने की मांग की, लेकिन सरकार ने इसे अस्वीकार कर दिया। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद का संशोधन प्रस्ताव भी सदन में खारिज हो गया।
विधेयक पारित होने के साथ ही मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का चौथा राज्य बनने की दिशा में आगे बढ़ गया है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि यह कानून सभी नागरिकों को समान अधिकार और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य किसी धर्म की परंपराओं में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि महिलाओं को समान अधिकार और सामाजिक सुरक्षा देना है। मुख्यमंत्री ने दावा किया कि मसौदे पर मिले सुझावों में बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं ने भी इसका समर्थन किया।
UCC के 5 प्रमुख प्रावधान
बहुविवाह पर रोक: पहली पत्नी या पति के जीवित रहते दूसरा विवाह मान्य नहीं होगा।
तलाक और हलाला पर प्रावधान: तलाक केवल वैधानिक प्रक्रिया के तहत होगा। तीन तलाक और निकाह हलाला को गैर-कानूनी एवं दंडनीय बनाया गया है।
लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण: साथ रहने वाले जोड़ों को एक माह के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना होगा। उल्लंघन पर जेल या जुर्माने का प्रावधान रहेगा।
संपत्ति में समान अधिकार: बेटों और बेटियों को पैतृक एवं अर्जित संपत्ति में समान उत्तराधिकार मिलेगा।
बच्चों को कानूनी संरक्षण: सरोगेसी और लिव-इन संबंधों से जन्मे बच्चों को वैध उत्तराधिकारी का दर्जा मिलेगा।
आदिवासी समुदाय रहेगा कानून के दायरे से बाहर
सरकार ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अधिसूचित जनजातियों पर यह कानून लागू नहीं होगा। सरकार का कहना है कि आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए यह निर्णय लिया गया है।
विपक्ष ने जताया विरोध
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और कांग्रेस विधायकों ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह जनहित के अन्य मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए यह विधेयक लेकर आई है। विपक्ष ने विधेयक को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की मांग की, जबकि भाजपा ने इसे सामाजिक समानता और महिला अधिकारों की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। अंततः ध्वनिमत से विधेयक पारित हो गया।


