-महेश दीक्षित
भोपाल। मध्यप्रदेश भाजपा में पूर्व गृहमंत्री और वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा को लेकर एक बार फिर सियासी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। दतिया उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद पार्टी संगठन में हुए बदलाव और नरोत्तम मिश्रा के समर्थक माने जाने वाले नेताओं-कार्यकर्ताओं पर हुई कार्रवाई से उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर कई तरह के सवाल उठे थे। लेकिन हाल के घटनाक्रम ने इन चर्चाओं को एक नया मोड़ दे दिया है।
दतिया उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद पार्टी ने दतिया की जिला कार्यकारिणी भंग कर दी थी। इसके बाद एक हजार से ज्यादा नरोत्तम समर्थक पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाला गया। इस घटनाक्रम को नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से भी देखा गया और माना जाने लगा कि पार्टी संगठन में उनका प्रभाव कमजोर हो रहा है।
हालांकि, हाल ही में ओरछा में हुई भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के दौरान नरोत्तम मिश्रा को मिली तवज्जो ने इन चर्चाओं को फिर हवा दे दी। इसके बाद जिस तरह से भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की उनसे मुलाकातों का सिलसिला सामने आया, उसने राजनीतिक गलियारों में नई अटकलों को जन्म दिया है।
नरोत्तम से मिलने पहुंचे क्षेत्रीय संगठन मंत्री और विजयवर्गीय-शाह
पहले क्षेत्रीय संगठन मंत्री अजय जामवाल ने नरोत्तम मिश्रा के निवास पहुंचकर उनसे मुलाकात की। इसके बाद सरकार में वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी उनके घर पहुंचे। अगले ही दिन मंत्री विजय शाह ने भी पूर्व गृहमंत्री से मुलाकात की।
लगातार दो दिनों में भाजपा के प्रमुख नेताओं की नरोत्तम मिश्रा से मुलाकात को महज सामान्य शिष्टाचार भेंट मानने के बजाय राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है। सवाल यही है कि आखिर पार्टी के भीतर नरोत्तम मिश्रा को लेकर क्या रणनीति बन रही है?
कुछ तो चल रहा है पार्टी में
दतिया उपचुनाव के बाद पैदा हुई परिस्थितियों के बावजूद अगर संगठन और सरकार के वरिष्ठ नेताओं की नरोत्तम मिश्रा से मुलाकातें हो रही हैं और उन्हें पार्टी के महत्वपूर्ण मंचों पर तवज्जो मिल रही है, तो इसके पीछे कोई राजनीतिक संदेश भी हो सकता है। हालांकि, भाजपा की ओर से इन मुलाकातों को लेकर अभी तक किसी तरह की आधिकारिक राजनीतिक घोषणा सामने नहीं आई है।
नरोत्तम फिर चर्चाओं में
ऐसे में फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश भाजपा की सियासत में नरोत्तम मिश्रा का नाम एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। आने वाले दिनों में पार्टी संगठन या सरकार की ओर से उन्हें लेकर कोई नई भूमिका सामने आती है या नहीं, इस पर राजनीतिक नजरें टिकी रहेंगी।
नरोत्तम को नजरअंदाज करना भाजपा के लिए आसान नहीं
पार्टी सूत्रों का कहना है कि दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटने का खामियाजा भाजपा को बड़ी हार के रूप में भुगतना पड़ा। इसके बाद उनके समर्थक माने जाने वाले कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों पर हुई कार्रवाई का संदेश भी पार्टी के पक्ष में नहीं गया। हालांकि, इन तमाम घटनाक्रमों के बावजूद नरोत्तम मिश्रा की लोकप्रियता और राजनीतिक जनाधार में कोई खास कमी नहीं आई है।
पार्टी नेतृत्व और उसके रणनीतिकार भी इस बात को अच्छी तरह समझ गये हैं कि नरोत्तम मिश्रा जैसे अनुभवी और प्रभावशाली नेता को फिलहाल पूरी तरह साइडलाइन करना भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है। यही वजह है कि हाल के घटनाक्रमों को नरोत्तम मिश्रा को लेकर पार्टी की रणनीति में संभावित बदलाव के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है।


