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    यह कैसी स्वतंत्रता… हम ‘स्व’ खोकर गढ़ रहे ‘तंत्र’!

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    महेश दीक्षित

    स्वतंत्रता दिवस केवल तिरंगा फहराने, राष्ट्रगान गाने और देशभक्ति के गीत सुनने का दिन नहीं है। यह वह अवसर है, जब हमें कुछ क्षण ठहरकर अपने भीतर झांकना चाहिए। हमें स्वयं से पूछना चाहिए-आजादी के इतने दशकों में हमने क्या हासिल किया और क्या खो दिया? हमने कितना मजबूत राष्ट्र बनाया और कितना मजबूत मनुष्य?

    सबसे बड़ा सवाल शायद यही है-क्या हमने स्वतंत्र भारत बनाया है या केवल एक मजबूत ‘तंत्र’ खड़ा किया है?

    1947 में आजाद भारत का पहला बजट करीब 197 करोड़ रुपए का था। वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार का कुल बजटीय व्यय बढक़र करीब 53.5 लाख करोड़ रुपए हो चुका है। अर्थव्यवस्था का आकार कई गुना बढ़ा है। सडक़ें, पुल, रेल, हवाई अड्डे, डिजिटल तकनीक और आधुनिक सुविधाएं हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। शहर बदल गए हैं, बाजार फैल गए हैं और भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बना रहा है।

    लेकिन विकास के इन आंकड़ों के बीच एक सवाल लगातार पीछा करता है-क्या हमारी समृद्धि ने हमें उतना ही संतुष्ट, संवेदनशील और सुखी बनाया है?

    कभी साधन सीमित थे। साइकिल परिवहन का साधन थी और घर में स्कूटर होना भी उपलब्धि माना जाता था। घर छोटे थे, मगर परिवार बड़े। इच्छाएं कम थीं, मगर अपनापन ज्यादा था। पड़ोसी केवल पड़ोसी नहीं होते थे, वे सुख-दुख के साथी होते थे। जीवन में सुविधाएं कम थीं, लेकिन संतोष शायद ज्यादा था।

    आज हमारे पास बहुत कुछ है, लेकिन संतोष कम होता जा रहा है। घर बड़े हुए, परिवार छोटे। आय बढ़ी, लेकिन इच्छाएं उससे कहीं तेज बढ़ीं। सुविधाएं बढ़ीं तो तनाव भी बढ़ा। बैंक खाते, क्रेडिट कार्ड, ऋण और ईएमआई ने जीवन को सुविधाजनक बनाया, लेकिन इसी के साथ हमें ऐसी दौड़ में भी धकेल दिया, जिसकी कोई अंतिम रेखा दिखाई नहीं देती।

    असल बदलाव हमारी अर्थव्यवस्था में जितना हुआ, उससे कहीं अधिक हमारी मानसिकता में हुआ है।

    कभी भारतीय जीवन का केंद्र ‘हम’ था। परिवार, कुटुंब, समाज और पड़ोसी हमारे जीवन का हिस्सा थे। अब ‘मैं’ धीरे-धीरे ‘हम’ पर भारी पड़ रहा है। आत्मनिर्भर होना अच्छी बात है, लेकिन आत्मनिर्भरता जब आत्मकेंद्रित होने लगे तो समाज कमजोर होने लगता है।

    संयुक्त परिवारों का टूटना केवल घरों का बंटना नहीं है। यह भावनात्मक सुरक्षा, बुजुर्गों के अनुभव और पीढय़िों के बीच संवाद के कमजोर होने की कहानी भी है।

    हमने धैर्य भी खोया है। पहले सफलता के लिए वर्षों की मेहनत स्वीकार्य थी। आज सब कुछ तुरंत चाहिए-तुरंत नौकरी, तुरंत पैसा, तुरंत सफलता, तुरंत प्रसिद्धि और तुरंत परिणाम। हमने प्रतीक्षा की संस्कृति खो दी है।

    जो कभी विलासिता था, आज आवश्यकता लगता है। जो आवश्यकता थी, वह पर्याप्त नहीं लगता। और पर्याप्त पाने के बाद भी मन अगले लक्ष्य की तलाश में दौड़ता रहता है।

    हमारे पास चीजें बढ़ती गईं और जीवन छोटा होता गया।

    सामाजिक स्तर पर भी तस्वीर पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। जिस भारत ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दुनिया को दिया, उसी भारत में धर्म और जाति के नाम पर बढ़ती दूरियां चिंता पैदा करती हैं।

    लोकतंत्र में मतभेद जरूरी हैं। विचार अलग हो सकते हैं, राजनीतिक पसंद अलग हो सकती है। लेकिन जब मतभेद मनभेद बन जाएं और राजनीतिक विरोध सामाजिक दुश्मनी में बदल जाए, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है।

    राष्ट्र की ताकत केवल सेना, अर्थव्यवस्था या तकनीक से नहीं बनती। उसकी असली ताकत सामाजिक विश्वास, आपसी सम्मान और नागरिकों के चरित्र से बनती है।

    सामाजिक न्याय जरूरी है। कमजोर और वंचित वर्ग को अवसर मिलना चाहिए। लेकिन न्याय का अर्थ योग्यता और परिश्रम को नकारना भी नहीं हो सकता। हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें सामाजिक न्याय और योग्यता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के पूरक बनें।

    किसान भी इस बदलते भारत का महत्वपूर्ण प्रश्न है। कभी किसान भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन का केंद्र था। आज बड़े औद्योगिक समूहों और कॉरपोरेट पूंजी का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। उद्योग और निवेश विकास के लिए आवश्यक हैं, लेकिन विकास की कसौटी केवल बड़े उद्योग, ऊंची इमारतें और बढ़ता बाजार नहीं हो सकती।

    विकास तब सार्थक है, जब उसकी रोशनी किसान के खेत, मजदूर के घर और सामान्य नागरिक के जीवन तक पहुंचे।

    राजनीति का चरित्र भी बदला है। कभी राजनीति लोकसेवा, त्याग और राष्ट्रधर्म से जुड़ी थी। सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति के चरित्र और मर्यादा को महत्व मिलता था। आज धनबल, अवसरवाद और सत्ता की प्रतिस्पर्धा ने राजनीति के नैतिक पक्ष को गंभीर चुनौती दी है।

    राजनीति यदि सेवा के बजाय साधन बन जाए और सत्ता साध्य बन जाए, तो लोकतंत्र का ढांचा भले मजबूत दिखे, उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है।

    मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इसलिए कहा गया क्योंकि उससे सत्ता से सवाल पूछने और समाज की आवाज बनने की अपेक्षा थी। लेकिन व्यावसायिक दबाव, राजनीतिक निकटता और टीआरपी की दौड़ ने पत्रकारिता के सामने नए सवाल खड़े किए हैं।

    पत्रकारिता का धर्म सत्ता की प्रशंसा नहीं, सत्य की खोज है।

    लोकतंत्र का प्रहरी दरवाजा सजाने के लिए नहीं, खतरे की घंटी बजाने के लिए होता है। मीडिया को सत्य, निर्भीकता और जनहित के अपने मूल धर्म की ओर लौटना होगा।

    भ्रष्टाचार की समस्या भी केवल प्रशासन की समस्या नहीं है। यह हमारे सामूहिक चरित्र का सवाल है। जब निजी स्वार्थ सार्वजनिक कर्तव्य पर भारी पडऩे लगे, तब कानून और संस्थाएं अकेले समाज को नहीं बदल सकतीं।

    मजबूत संस्थाएं केवल मजबूत कानूनों से नहीं, मजबूत चरित्र वाले लोगों से बनती हैं।

    यहीं हमें विकास और समृद्धि के बीच का फर्क समझना होगा।

    विकास आंकड़ों में दिखाई देता है, लेकिन समृद्धि जीवन की गुणवत्ता में महसूस होती है।

    बजट बढ़ सकता है। सडक़ें चौड़ी हो सकती हैं। बाजार विशाल हो सकता है। तकनीक हमारे हाथ में आ सकती है। लेकिन यदि मन अशांत है, परिवार बिखर रहे हैं, समाज में अविश्वास बढ़ रहा है और सत्य तथा ईमानदारी कमजोर हो रही है, तो हमें अपनी प्रगति की परिभाषा पर फिर विचार करना होगा।

    उपनिषद का संदेश है-‘सत्यमेव जयते।’

    लेकिन सत्य, धर्म, संतोष, करुणा, त्याग और कर्तव्य जैसे मूल्यों का कमजोर होना बताता है कि हमारी सबसे बड़ी चुनौती बाहर नहीं, भीतर है।

    आज स्वतंत्रता दिवस पर हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि भारत कितना बड़ा आर्थिक राष्ट्र बना। हमें यह भी पूछना चाहिए-

    क्या भारतीय उतना ही बड़ा मनुष्य बना?

    क्या परिवार मजबूत हुआ?

    क्या समाज में विश्वास बढ़ा?

    क्या चरित्र बचा?

    क्या योग्यता को सम्मान मिला?

    क्या गरीब और कमजोर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अवसर मिला?

    क्या राजनीति अधिक नैतिक हुई?

    क्या पत्रकारिता अधिक निर्भीक हुई?

    और सबसे बड़ा सवाल-

    क्या हमारा मन सचमुच स्वतंत्र हुआ?

    स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है।

    लालच से मुक्ति भी स्वतंत्रता है।

    भय से मुक्ति भी स्वतंत्रता है।

    घृणा से मुक्ति भी स्वतंत्रता है।

    दिखावे की दौड़ से मुक्ति भी स्वतंत्रता है।

    और अपने भीतर के स्वार्थ पर विजय पाना भी स्वतंत्रता है।

    आज हम एक ऐसे भारत में खड़े हैं, जिसने दुनिया में अपनी पहचान मजबूत की है। हमारी अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, तकनीक आगे बढ़ रही है और दुनिया भारत की ओर उम्मीद से देख रही है। यह गर्व का विषय है।

    लेकिन इसी गर्व के बीच हमें अपने ‘स्व’ को तलाशना होगा।

    क्योंकि तंत्र कितना भी मजबूत क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाला मनुष्य भीतर से कमजोर हो जाए तो वह तंत्र भी अंतत: खोखला हो जाता है।

    हमें ऐसा भारत नहीं चाहिए जहां केवल इमारतें ऊंची हों, बल्कि ऐसा भारत चाहिए जहां विचार ऊंचे हों।

    ऐसा भारत नहीं जहां केवल बाजार बड़ा हो, बल्कि ऐसा भारत जहां मन बड़ा हो।

    ऐसा भारत नहीं जहां केवल अर्थव्यवस्था मजबूत हो, बल्कि ऐसा भारत जहां संवेदना उससे भी मजबूत हो।

    तकनीक आधुनिक हो, लेकिन संस्कार जीवित रहें।

    शहर ऊंचे हों, लेकिन मन संकुचित न हों।

    समृद्धि बढ़े, लेकिन संवेदना न घटे।

    और सबसे बढक़र-हम ‘तंत्र’ बनाते हुए अपना ‘स्व’ न खो दें।

    स्वतंत्रता दिवस पर यही आत्ममंथन सबसे जरूरी है।

    क्योंकि राष्ट्र केवल बड़ी अर्थव्यवस्था, विशाल बजट और आधुनिक तकनीक से महान नहीं बनता।

    राष्ट्र महान बनता है अपने नागरिकों के चरित्र, संस्कार, संवेदना और स्वतंत्र चेतना से।

    और यदि हमें सचमुच स्वतंत्र भारत को महान बनाना है, तो अब केवल तंत्र को मजबूत करने का नहीं, ‘स्व’ को बचाने और संवारने का समय है।

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