मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग की नई तबादला नीति इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। नीति के अनुसार विधवा और परित्यक्ता महिला कर्मचारियों को तबादले के लिए आवेदन करने से पहले एसडीएम या न्यायालय से प्रमाण-पत्र प्राप्त करना होगा। सरकार इसे पारदर्शिता और सत्यापन की प्रक्रिया बता रही है, लेकिन इसने कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या किसी महिला की व्यक्तिगत और संवेदनशील परिस्थितियों को साबित करने के लिए अतिरिक्त प्रशासनिक बाधाएं खड़ी करना उचित है? विधवा होना या परित्यक्ता होना कोई सुविधा प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन की एक कठिन सामाजिक और भावनात्मक स्थिति है। ऐसे में संबंधित महिला कर्मचारी से पहले अपने निजी जीवन का प्रमाण प्रस्तुत करने की अपेक्षा करना कई लोगों को असंवेदनशील कदम प्रतीत हो रहा है।
यह भी उल्लेखनीय है कि प्रदेश के अन्य विभागों की तबादला नीतियों में ऐसी कोई शर्त नहीं रखी गई है। स्कूल शिक्षा विभाग सहित अधिकांश विभागों में कर्मचारी केवल ऑनलाइन घोषणा के आधार पर आवेदन कर सकते हैं। फिर केवल स्वास्थ्य विभाग ने ही इस अतिरिक्त प्रक्रिया को क्यों लागू किया, इसका स्पष्ट उत्तर अब तक सामने नहीं आया है।
निस्संदेह, प्रशासन को फर्जी दावों को रोकने और व्यवस्था में पारदर्शिता बनाए रखने का अधिकार है। यदि अतीत में ऐसी श्रेणियों का गलत लाभ उठाने के मामले सामने आए हों, तो सत्यापन की आवश्यकता को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। लेकिन सत्यापन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो कर्मचारियों की गरिमा और सम्मान को ठेस न पहुंचाए। तकनीक के इस दौर में विभाग स्वयं विभिन्न सरकारी रिकॉर्ड के माध्यम से आवश्यक जानकारी का सत्यापन कर सकता है।
स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत महिलाएं पहले से ही चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सेवाएं देती हैं। उनके लिए तबादले की प्रक्रिया को सरल और मानवीय बनाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। किसी भी नीति का उद्देश्य सुविधा प्रदान करना होना चाहिए, न कि अतिरिक्त बोझ बढ़ाना। सरकार को इस प्रावधान पर पुनर्विचार करते हुए ऐसा संतुलित समाधान निकालना चाहिए, जिसमें पारदर्शिता भी बनी रहे और महिला कर्मचारियों की गरिमा भी सुरक्षित रहे। आखिर प्रशासनिक व्यवस्था का असली उद्देश्य नागरिकों और कर्मचारियों के जीवन को आसान बनाना है, कठिन नहीं।


