भोपाल के अरेरा हिल्स थाना प्रभारी सुनील शर्मा और एक आरक्षक के निलंबन की खबर को यदि केवल एक पुलिस अधिकारी के कथित अनैतिक आचरण तक सीमित कर दिया जाए, तो यह मामले की आधी तस्वीर होगी। असली सवाल उस व्यवस्था से है, जिसने गंभीर आरोपों और लंबित आपराधिक प्रकरणों के बावजूद एक अधिकारी को राजधानी के सबसे संवेदनशील थानों में से एक की जिम्मेदारी सौंप दी।
यदि किसी अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामला अदालत में विचाराधीन है, तो क्या उसका सेवा रिकॉर्ड पोस्टिंग से पहले नहीं देखा गया? क्या पुलिस मुख्यालय के वे आदेश केवल फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए जारी किए गए थे, जिनमें साफ कहा गया था कि आपराधिक प्रकरणों, विभागीय जांच या नैतिक अध:पतन के आरोपों का सामना कर रहे अधिकारियों को फील्ड पोस्टिंग नहीं दी जाएगी? यदि आदेश मौजूद थे, तो उनका पालन किसने नहीं किया और क्यों नहीं किया?
यह तर्क अब नहीं चल सकता कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई कर दी गई, इसलिए मामला समाप्त हो गया। सवाल यह है कि यदि शिकायत सामने नहीं आती तो क्या वही अधिकारी संवेदनशील थाने की कमान संभाले रहते? यदि उत्तर ‘हां’ है, तो यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, पूरी पोस्टिंग प्रणाली की विफलता है।
पुलिस महकमे में तबादले और पदस्थापन हमेशा चर्चा का विषय रहे हैं। योग्यता, अनुभव और निष्पक्षता के बजाय यदि प्रभाव, पसंद या अन्य कारण निर्णय तय करने लगें, तो ऐसे विवाद अपरिहार्य हो जाते हैं। इसलिए इस मामले की जांच केवल आरोपों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जांच की दिशा उस फाइल तक भी पहुंचनी चाहिए, जिस पर पोस्टिंग की मंजूरी दी गई थी।
यह भी तय होना चाहिए कि यदि नियमों की अनदेखी कर किसी अधिकारी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई, तो उसके लिए जवाबदेह कौन है। केवल निलंबन से संस्थागत जवाबदेही पूरी नहीं होती। जवाबदेही वहीं से शुरू होती है, जहां निर्णय लिया जाता है।
पुलिस व्यवस्था जनता के भरोसे पर खड़ी होती है। यह भरोसा तभी मजबूत होगा, जब नियम सबके लिए समान हों और उनका पालन कराने वालों पर भी उतनी ही सख्ती लागू हो, जितनी नियम तोड़ने वालों पर होती है। वरना हर बार कोई एक अधिकारी कटघरे में खड़ा होगा और व्यवस्था खुद पर्दे के पीछे सुरक्षित बनी रहेगी।


