सोशल मीडिया कभी लोगों को जोडऩे का माध्यम था, अब धीरे-धीरे यह युवाओं की जिंदगी का ऐसा हिस्सा बनता जा रहा है, जिससे दूरी बनाना मुश्किल हो गया है। मोबाइल की स्क्रीन पर लगातार बने रहने की आदत केवल समय बर्बाद नहीं कर रही, बल्कि युवाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल रही है।
अमेरिका के न्यू मैक्सिको की अदालत का मेटा पर 942 मिलियन डॉलर यानी करीब 9,030 करोड़ रुपए का जुर्माना इसी बड़े खतरे की ओर इशारा करता है। मामला केवल इंस्टाग्राम और फेसबुक के इस्तेमाल का नहीं, बल्कि उन डिजिटल प्रणालियों का है, जो यूजर को अधिक से अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने के लिए डिजाइन की जाती हैं। जब यही रणनीति बच्चों और किशोरों पर लागू होती है तो सवाल मुनाफे से आगे बढक़र सामाजिक जिम्मेदारी का बन जाता है।
लगातार स्क्रीन देखने से नींद प्रभावित होना, शारीरिक गतिविधि कम होना, आंखों में परेशानी, गर्दन और पीठ की समस्याएं तथा जीवनशैली से जुड़ी दूसरी दिक्कतें बढ़ सकती हैं। दूसरी ओर लगातार तुलना, लाइक्स और फॉलोअर्स की चिंता, साइबर बुलिंग और अवास्तविक जीवनशैली की तस्वीरें युवाओं में तनाव, बेचैनी और आत्मसम्मान से जुड़ी समस्याएं पैदा कर सकती हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस लत को अक्सर सामान्य व्यवहार मान लिया जाता है। बच्चा घंटों मोबाइल में लगा है तो माता-पिता उसे व्यस्त समझते हैं, जबकि वह धीरे-धीरे एक ऐसे डिजिटल चक्र में फंस सकता है, जिसमें हर नोटिफिकेशन और हर नया वीडियो उसे फिर स्क्रीन पर खींच लाता है।
इसलिए समाधान केवल सोशल मीडिया पर प्रतिबंध नहीं है। प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, उम्र सत्यापन, बच्चों के लिए सुरक्षित डिफॉल्ट सेटिंग, एल्गोरिदम की निगरानी और डिजिटल साक्षरता जरूरी है। परिवारों को भी बच्चों के स्क्रीन टाइम से ज्यादा उनके व्यवहार में आए बदलावों पर नजर रखनी होगी। जुर्माना कंपनियों को चेतावनी दे सकता है, लेकिन युवाओं को इस डिजिटल नशे से बचाने के लिए समाज को अपनी आदतें भी बदलनी होंगी। तकनीक हमारे जीवन को आसान बनाने के लिए है, जीवन को अपने नियंत्रण में लेने के लिए नहीं।


