Sagar Liquor Tragedy: सागर में जहरीली शराब से 20 से अधिक लोगों की मौत ने मध्यप्रदेश की आबकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह केवल अवैध शराब के कारोबार का मामला नहीं है, बल्कि उस निगरानी तंत्र की विफलता भी है, जिसकी जिम्मेदारी ऐसे कारोबार को समय रहते रोकने की है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार और प्रशासन को कार्रवाई के लिए इतने बड़े हादसे का इंतजार करना जरूरी था?
सागर की घटना के बाद अब सभी कलेक्टरों को अवैध शराब के निर्माण, भंडारण, बिक्री और परिवहन के खिलाफ विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, अचानक छापेमारी, संदिग्ध वाहनों की जांच, सूचना तंत्र मजबूत करने और पुलिस के साथ संयुक्त कार्रवाई जैसे कदम उठाने की बात कही गई है। गंभीर मामलों की अलग रिपोर्ट और दैनिक प्रगति रिपोर्ट भी अनिवार्य की गई है।
ये कदम जरूरी हैं, लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितनी व्यवस्थाएं हादसे से पहले प्रभावी रूप से लागू थीं? यदि संवेदनशील क्षेत्र पहले से चिन्हित किए जाते, अवैध भट्टियों और शराब के अड्डों पर नियमित निगरानी होती और संदिग्ध परिवहन पर लगातार नजर रखी जाती, तो क्या सागर जैसी त्रासदी को टाला जा सकता था?
सरकार ने अब अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की बात भी कही है। विश्वसनीय सूचना पर समय पर कार्रवाई नहीं करने या गंभीर अनियमितता की अनदेखी करने पर विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। यही व्यवस्था यदि नियमित निगरानी का हिस्सा बन जाए तो उसका असर कहीं ज्यादा होगा।
अवैध शराब केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है। यह सीधे जनस्वास्थ्य और मानव जीवन से जुड़ा खतरा है। इसलिए कार्रवाई केवल घटना के बाद छापेमारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सूचना तंत्र, स्थानीय स्तर की निगरानी, लाइसेंसी दुकानों का निरीक्षण और अवैध परिवहन की रोकथाम लगातार चलने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए।
सागर की त्रासदी से सरकार को एक स्थायी सबक लेना होगा। प्रशासन की सक्रियता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि हादसे के बाद कितनी कार्रवाई हुई, बल्कि यह होना चाहिए कि हादसा होने से पहले कितनी जानें बचाई गईं। अगर नई व्यवस्था केवल कुछ दिनों की विशेष ड्राइव बनकर रह गई, तो सागर जैसे हादसों का खतरा फिर बना रहेगा।


