Madhya Pradesh Roads मप्र में हर साल सडक़ों के निर्माण और मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। इसके बावजूद बारिश आते ही प्रदेश की अनेक सडक़ें गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं। सवाल यह नहीं है कि सडक़ें क्यों टूट रही हैं, सवाल यह है कि बार-बार सडक़ें टूटने के बावजूद इसकी जवाबदेही आखिर तय क्यों नहीं होती?
लोक निर्माण विभाग ने हाल ही में सडक़ और भवन निर्माण की गुणवत्ता को लेकर सख्ती दिखाई है। उसकी टीमों ने रायसेन, नरसिंहपुर, शिवपुरी, खंडवा, शहडोल, शाजापुर और सागर में अचानक निरीक्षण कर 35 निर्माण कार्यों की जांच की। कई जगह निर्माण की गुणवत्ता और काम की गति संतोषजनक नहीं मिली। अधिकारियों को सुधार के साथ संबंधित ठेकेदारों और इंजीनियरों पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। शहडोल में सरना से करकट रोड की गुणवत्ता खराब मिलने पर संबंधित ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए। गेरुई-जेमुनिहा सडक़ का काम धीमा मिला तो 15 दिन में पूरा करने का नोटिस दिया गया। सागर में बसाहरी पीएमजीएसवाई रोड से निवाड़ी रोड और खुरई के गढ़ोला जागीर में सरकारी स्कूल भवन के निर्माण में भी कमियां मिलीं। यह कार्रवाई जरूरी है, लेकिन इससे बड़ा सवाल व्यवस्था पर है। यदि निर्माण की गुणवत्ता खराब थी तो उसे अंतिम निरीक्षण से पहले क्यों नहीं पकड़ा गया? संबंधित इंजीनियरों और अधिकारियों ने निर्माण के दौरान क्या निगरानी की? भुगतान किस आधार पर किया गया? क्या गुणवत्ता जांच केवल कागजों पर होती रही?
यह सही है कि सडक़ निर्माण में ठेकेदार की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन पूरी जिम्मेदारी उसी की नहीं है। सडक़ की डिजाइन, तकनीकी स्वीकृति, गुणवत्ता परीक्षण, निरीक्षण, बिलों के भुगतान और रखरखाव की पूरी प्रक्रिया में विभागीय अधिकारी शामिल होते हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधि भी जनता की शिकायतों और विकास कार्यों की निगरानी की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
इसलिए किसी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट कर देना समस्या का अंतिम समाधान नहीं हो सकता। यदि घटिया सडक़ बनी है तो यह भी जांचना चाहिए कि ठेकेदार के काम को किस अधिकारी ने मंजूरी दी, किसने निरीक्षण किया और किसने भुगतान की अनुशंसा की। यदि भ्रष्टाचार के आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। तथा जहां गड़बड़ी मिले वहां जिम्मेदारी तय करने में सरकार को पीछे नहीं हटना चाहिए। लोकपथ ऐप और सीएम हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएं जनता को शिकायत दर्ज कराने का अधिकार देती हैं। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि लोकपथ ऐप की शिकायतों का चार दिन में निराकरण हो और शिकायतकर्ता की संतुष्टि भी सुनिश्चित की जाए। यह अच्छी पहल है, लेकिन शिकायत बंद करने और समस्या खत्म करने में फर्क है। सरकार को सडक़ निर्माण में थर्ड पार्टी गुणवत्ता जांच, जियो-टैगिंग, निर्माण की सार्वजनिक जानकारी और दोषपूर्ण सडक़ की जवाबदेही तय करने जैसी व्यवस्थाओं को और मजबूत करना चाहिए। सडक़ बनने के बाद उसकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी तय अवधि तक संबंधित एजेंसी और ठेकेदार पर होनी चाहिए। जनता को ऐसी सडक़ें चाहिए जो उद्घाटन के कुछ महीने बाद नहीं, बल्कि वर्षों तक चलें। आखिर सडक़ें जनता के पैसे से बनती हैं। इसलिए सवाल सीधा है-सडक़ें गड्ढों में जाएं तो सिर्फ ठेकेदार नहीं, पूरी व्यवस्था जवाबदेह क्यों न हो?


