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    लोकतंत्र बचाओ यात्रा में लोकतांत्रिक मर्यादा भूले मंत्री कैलाश विजयवर्गीय

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    लोकतंत्र बचाने का नारा लेकर निकली भाजपा की पदयात्रा में मध्य प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय खुद लोकतांत्रिक मर्यादाओं को लेकर सवालों के घेरे में आ गए। इंदौर में आयोजित ‘लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ’ पदयात्रा के दौरान एक समाजसेवी के पोस्टर ने उन्हें इस कदर नाराज कर दिया कि वे सार्वजनिक रूप से आपा खो बैठे। उन्होंने समाजसेवी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया और पुलिस अधिकारी से उसे हिरासत में लेने को कह दिया।

    दरअसल, समाजसेवी प्रहलाद पांडे पदयात्रा में एक पोस्टर लेकर पहुंचे थे। पोस्टर पर लिखा था- ‘30 हजार का बल्ब और 33 हजार लीटर फिनाइल।’ बताया जा रहा है कि यह पोस्टर शहर में सरकारी खर्च और व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठाने के उद्देश्य से लाया गया था। पोस्टर देखते ही विजयवर्गीय भड़क गए। उन्होंने कथित तौर पर कहा- ‘साला इतने जूते खाने के बाद भी यहां पर आ गया।’ इसके बाद उन्होंने पुलिस अधिकारी को उसे गाड़ी में बैठाने का निर्देश दिया।

    इस घटनाक्रम ने एक बार फिर कैलाश विजयवर्गीय की सार्वजनिक भाषा और राजनीतिक आचरण पर बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ एक समाजसेवी को कहे गए अपशब्दों का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक मानसिकता का है जिसमें असहमति को सुनने के बजाय उसे दबाने की कोशिश दिखाई देती है।

    लोकतंत्र की खूबसूरती ही इस बात में है कि यहां सत्ता से सवाल पूछे जा सकते हैं। सरकार के खर्च, फैसलों और नीतियों पर सवाल उठाना नागरिक का अधिकार है, कोई अपराध नहीं। यदि किसी पोस्टर पर लिखी बात गलत है तो उसका जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए, न कि गाली और पुलिसिया कार्रवाई की धमकी से।

    कैलाश विजयवर्गीय प्रदेश की राजनीति के वरिष्ठ नेता हैं और मंत्री पद पर बैठे हैं। ऐसे पद पर आसीन व्यक्ति के शब्दों और व्यवहार की जवाबदेही सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता से कहीं अधिक होती है। सार्वजनिक मंच पर इस्तेमाल की गई भाषा केवल व्यक्तिगत स्वभाव का परिचय नहीं देती, बल्कि राजनीतिक संस्कार और सत्ता के प्रति दृष्टिकोण भी उजागर करती है।

    विडंबना यह है कि जिस यात्रा का उद्देश्य लोकतंत्र बचाने और अराजकता हटाने का संदेश देना है, उसी में एक नागरिक के विरोध पर इस तरह की प्रतिक्रिया सामने आई। लोकतंत्र केवल नारे लगाने से नहीं बचता, बल्कि असहमति का सम्मान करने और आलोचना को धैर्यपूर्वक सुनने से मजबूत होता है। सत्ता को यह समझना होगा कि सवाल पूछने वालों को चुप कराना लोकतंत्र की रक्षा नहीं, उसकी आत्मा को कमजोर करना है।

     

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