माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में नवागत विद्यार्थियों के प्रबोधन कार्यक्रम की वक्ता सूची को लेकर उठे सवाल महज किसी एक वर्ग को मंच पर स्थान मिलने या नहीं मिलने तक सीमित नहीं हैं। यह बहस इससे कहीं बड़ी है। सवाल यह है कि पत्रकारिता सिखाने वाला संस्थान क्या समाज की विविधता को अपने मंच पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व दे रहा है?
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज से वक्ताओं का स्पष्ट प्रतिनिधित्व नहीं होने पर मप्र कांग्रेस के अनुसूचित विभाग ने सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने विश्वविद्यालय के वातावरण को एक खास विचारधारा से प्रभावित होने का आरोप भी लगाया है। यह आरोप राजनीतिक है और इस पर अलग बहस हो सकती है, लेकिन प्रतिनिधित्व के मूल सवाल को केवल राजनीतिक बयान कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज की हर आवाज को सामने लाना है। पत्रकारिता के विद्यार्थी जब भविष्य में रिपोर्टिंग के लिए समाज के बीच जाएंगे, तो उन्हें केवल सत्ता, सरकार और प्रभावशाली वर्गों की दृष्टि से समाज को नहीं देखना होगा। उन्हें उन समुदायों की समस्याओं और अनुभवों को भी समझना होगा, जिनकी आवाज मुख्यधारा में अपेक्षाकृत कम सुनाई देती है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और अन्य वंचित समुदायों के पत्रकारों, लेखकों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुभव विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण सीख बन सकते हैं।
लेकिन प्रतिनिधित्व का मतलब यह भी नहीं कि वक्ता का चयन केवल जातीय या सामाजिक पहचान के आधार पर किया जाए। योग्यता, विषय विशेषज्ञता और अनुभव किसी भी वक्ता के चयन की पहली कसौटी होने चाहिए। इसके साथ यह भी जरूरी है कि चयन प्रक्रिया समाज के अलग-अलग वर्गों की योग्य प्रतिभाओं तक समान रूप से पहुंचे। विविधता योग्यता का विकल्प नहीं, बल्कि योग्य प्रतिभाओं को समान अवसर देने की व्यवस्था है।
विश्वविद्यालय प्रबंधन को इस पूरे विवाद का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शिता से देना चाहिए। वक्ताओं के चयन के मानदंड सार्वजनिक किए जा सकते हैं। इससे अनावश्यक विवाद भी कम होंगे और संस्थान की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।
सामाजिक न्याय किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी भावना है। पत्रकारिता विश्वविद्यालय इस भावना को मजबूत करने की जिम्मेदारी रखते हैं। मंच पर कितने लोग किस विचारधारा के थे, यह महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि क्या उस मंच पर समाज की जरूरी और विविध आवाजों के लिए पर्याप्त जगह थी। यही कसौटी किसी पत्रकारिता संस्थान की लोकतांत्रिक और समावेशी सोच को परखने की होनी चाहिए।


