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    क्या लोकतंत्र में व्यवस्था से सवाल करना गलत है?

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    -महेश दीक्षित

    Prahlad Pandey:इंदौर में सामाजिक कार्यकर्ता प्रहलाद पांडेय ने पत्नी संगीता पांडेय के साथ गांधी प्रतिमा के नीचे शुरू किया गया धरना घटना के बाद भले ही समाप्त कर दिया हो, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है-क्या लोकतंत्र में सरकार और व्यवस्था से सवाल पूछना गलत है?

    पांडेय अवैध होर्डिंग और पोस्टरों के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। मरीमाता चौराहे पर कथित अवैध बैनर-पोस्टरों का वीडियो बनाते समय उनके साथ मारपीट किए जाने और मोबाइल अथवा उपकरण छीने जाने के आरोप सामने आए हैं। पांडेय ने इस घटना के लिए विधायक गोलू शुक्ला के समर्थकों को जिम्मेदार बताया है। इन आरोपों की सच्चाई जांच का विषय है और इसका निर्धारण पुलिस की निष्पक्ष जांच से ही होना चाहिए।

    लेकिन इससे भी बड़ा सवाल उस व्यवस्था पर है, जिसमें किसी नागरिक को अपनी शिकायत के लिए सड़क पर उतरना पड़े। यदि शहर में अवैध होर्डिंग और पोस्टर लगे हैं तो उन्हें हटाना संबंधित प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि कोई नागरिक इसकी ओर ध्यान आकर्षित करता है, तो उसकी शिकायत को सुना जाना चाहिए, न कि विवाद का विषय बनाया जाना चाहिए।

    लोकतंत्र केवल चुनाव और मतदान का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि नागरिक सार्वजनिक व्यवस्था पर सवाल उठा सके, अपनी शिकायत दर्ज करा सके और शासन-प्रशासन से जवाब मांग सके। असहमति लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। उसका उत्तर संवाद और कानून के जरिए होना चाहिए।

    इंदौर जैसे बड़े शहर में होर्डिंग और पोस्टर केवल सौंदर्य का विषय नहीं हैं। नियमों का उल्लंघन होने पर यातायात, सार्वजनिक स्थानों और शहर की व्यवस्था पर भी इसका असर पड़ सकता है। इसलिए कार्रवाई हो तो वह निष्पक्ष और नियमों के आधार पर होनी चाहिए-चाहे होर्डिंग किसी आम व्यक्ति का हो या किसी प्रभावशाली व्यक्ति अथवा राजनीतिक समर्थक का।

    पांडेय ने धरना तोड़ दिया है, लेकिन इससे वे सवाल खत्म नहीं हो जाते जिनके कारण उन्होंने धरना शुरू किया था। प्रशासन के सामने अब अवसर है कि वह पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए, अवैध होर्डिंग-पोस्टरों पर नियमों के मुताबिक कार्रवाई करे और मारपीट के आरोपों की भी सच्चाई सामने लाए।

    क्योंकि सवाल केवल प्रहलाद पांडेय का नहीं है। सवाल यह है कि क्या इस शहर का कोई आम नागरिक व्यवस्था से सवाल पूछ सकता है? अगर जवाब हां है, तो उस सवाल का जवाब कानून और प्रशासनिक कार्रवाई से मिलना चाहिए, दबाव या डर से नहीं।

    धरना खत्म हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में सवाल खत्म नहीं होते।

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